मध्य प्रदेश की तीन फसलों को मिलेगा जीआई टैग, सिताही और नागदमन कुटकी के साथ बैंगनी अरहर का नामांकन 

Millets Crops GI Tag: मध्य प्रदेश सरकार ने कहा कि ग्लोबल मार्केट में श्रीअन्न की मांग बढ़ रही है. इसका लाभ स्थानीय किसानों को दिलाने के लिए कई देशी और स्थानीय फसलों को जीआई टैग दिलाने की कवायद तेज की गई है. तीन फसलों के लिए जीआई टैग नामांकन प्रक्रिया कराई गई है.

रिजवान नूर खान
नोएडा | Updated On: 29 Mar, 2026 | 01:05 PM

Madhya Pradesh News: मध्यप्रदेश की तीन फसलों सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर को जल्द जीआई टैग मिलने जा रहा है. तीनों फसलों के प्रस्ताव तैयार कर परीक्षण के लिए भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री चैन्नई भेज दिए गए हैं और नामांकन कराया गया है. जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय ने दस्तावेज तैयार करके भेजे हैं. सिताही कुटकी एक कम अवधि वाली बाजरा छोटी और देसी किस्म है. इसी तरह नागदमन कुटकी खास तरह के औषधीय गुणों और पोषण से लैस देसी किस्म हैं. बैंगनी अरहर दाल की खास किस्म है और इसमें फलियां बैंगनी रंग की होती हैं. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि इन फसलों को जीआई टैग मिलने से देशभर में बिक्री आसान हो जाएगी और इन्हें उगाने वाले आदिवासी किसानों की कमाई बढ़ेगी और आर्थिक मजबूती मिलेगी.

मध्य प्रदेश सरकार के आधिकारिक बयान के अनुसार श्रीअन्न उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर काम किया जा रहा है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जनजातीय बहुल क्षेत्रों में पारंपरिक कोदो-कुटकी को बचाने और उत्पादन करने के लिये किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं. औषधीय खूबियों और पौष्ट‍िकता के चलते अब दुनिया श्रीअन्न की ओर लौट रही है. ग्लोबल मार्केट में श्रीअन्न की मांग बढ़ रही है. इसका लाभ स्थानीय किसानों को दिलाने के लिए कई देशी और स्थानीय फसलों को जीआई टैग दिलाने की कवायद तेज की गई है.

सिताही कुटकी को जीआई टैग के लिए चेन्नई भेजा गया

सिताही कुटकी (Sitahi Kutki) एक कम अवधि (60 दिन) वाली ‘लिटिल मिलेट’ यानी बाजरा की छोटी की देशी किस्म है. यह बारिश आधारित क्षेत्रों और देर से बुवाई की स्थितियों के लिए उपयुक्त है. यह सूखे की मार, नमी की कमी, प्रमुख कीटों (शूट फ्लाई), ग्रेन स्मट और ब्राउन स्पॉट जैसी बीमारियों का सामना करने में सक्षम है. यह किसानों को एक स्थिर पैदावार दिलाने में मददगार साबित होती है. सिताही कुटकी की मध्यम ऊंचाई और मोटे तने के कारण फसल के गिरने की समस्या नहीं रहती. इसे पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ तथा कमजोर मिट्टी वाली स्थितियों में भी उगाया जा सकता है. मध्य प्रदेश के डिण्डोरी के बैगा और गोंड जनजातियों के किसान इसे खूब पैदा करते हैं.

डिंडोरी में सिताही कुटकी की खेती की 10,395 हेक्टेयर क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है. जबकि, पैदावार में 10-11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का इजाफा हुआ है. डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, शहडोल, उमरिया, बालाघाट और जबलपुर के कुछ हिस्सों के लगभग 60,000 आदिवासी किसान इसकी खेती करते हैं. डिंडोरी के पहाड़ी और मुश्किल इलाकों के 54 गांवों के किसानों को इसकी खेती से मुनाफा हुआ है. इन इलाकों में दूसरी रबी फसलों की खेती नहीं होती है.

नागदमन कुटकी को जीआई टैग मिलेगा

मध्य प्रदेश सरकार ने खास किस्म की कुटकी नागदमन कुटकी (Nagdaman Kutki) को जीआई टैग दिलाने के लिए चेन्नई ऑफिस भेजा गया है. नागदमन कुटकी डिंडोरी जिले में उगाई जाने वाली कुटकी की एक विशिष्ट स्थानीय किस्म है. यह अपने औषधीय गुणों और उच्च पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है. नागदमन कुटकी की खेती आदिवासी किसान खूब करते हैं.

20 क्विंटल पैदावार वाली बैंगनी अरहर को जीआई टैग मिलेगा

मध्य प्रदेश की अरहर दाल की देसी किस्म बैंगनी अरहर (Purple Pigeon Pea) को जीआई टैग मिलेगा. इसके लिए तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. बैंगनी अरहर में पौधे या फलियों पर बैंगनी रंग की झलक होती है. इसमें भरपूर प्रोटीन होता है. रोगों से लड़ने की जबरदस्त क्षमता होती है. अच्छी देखभाल होने पर 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन हो सकता है.

जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय ने जीआई टैग के लिए प्रक्रिया पूरी की

जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर ने ‘भौगोलिक संकेतक’ (GI Tag) जीआई टैग के लिए दस्तावेज तैयार किए हैं. इससे राष्ट्रीय स्तर पर ‘सिताही कुटकी’ का एक ब्रांड नाम स्थापित होगा. इसके अलावा अन्य फसलों को भी जीआई टैग मिलने से बाजार के नए अवसर खुलेंगे. इससे इन फसलों की खेती करने वाले जनजातीय किसानों को आर्थ‍िक लाभ होगा. बता दें कि जीआई टैग मिलने से इस फसल की शुद्धता और गुणवत्ता की गारंटी मिलेगी. अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी मांग बढ़ेगी. वैश्विक स्तर पर पहचान मिलेगी.

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Published: 29 Mar, 2026 | 01:00 PM
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