राजस्थान से यूपी तक सरसों की फसल लहलहाई, पैदावार में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी का अनुमान

इस सीजन में सरसों की खेती का रकबा पिछले साल की तुलना में साफ तौर पर बढ़ा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में किसानों ने सरसों की ओर ज्यादा रुझान दिखाया है. देशभर में सरसों की खेती का कुल रकबा बढ़कर करीब 89.36 लाख हेक्टेयर हो गया है, जबकि पिछले साल यह 86.57 लाख हेक्टेयर था.

नई दिल्ली | Published: 27 Jan, 2026 | 03:01 PM

देश के किसानों के लिए इस रबी सीजन से एक अच्छी खबर सामने आ रही है. पिछले साल उत्पादन में गिरावट झेलने के बाद इस बार सरसों की फसल बेहतर हालात में दिखाई दे रही है. कृषि विशेषज्ञों और सरकारी आकलन के अनुसार, 2025-26 में सरसों की पैदावार में कम से कम 10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है. इसकी सबसे बड़ी वजह है खेती का बढ़ता रकबा और अब तक अनुकूल बना मौसम.

प्रमुख राज्यों में बढ़ा सरसों का रकबा

इस सीजन में सरसों की खेती का रकबा पिछले साल की तुलना में साफ तौर पर बढ़ा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में किसानों ने सरसों की ओर ज्यादा रुझान दिखाया है. देशभर में सरसों की खेती का कुल रकबा बढ़कर करीब 89.36 लाख हेक्टेयर हो गया है, जबकि पिछले साल यह 86.57 लाख हेक्टेयर था. यानी करीब 3.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

राजस्थान में सरसों का रकबा हल्का बढ़कर 35.35 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है. हालांकि यह अब भी 2022-23 के रिकॉर्ड स्तर से थोड़ा कम है, लेकिन फसल की स्थिति कहीं बेहतर बताई जा रही है. मध्य प्रदेश में सबसे बड़ी छलांग देखने को मिली है, जहां सरसों का क्षेत्रफल लगभग 41 प्रतिशत बढ़कर 11.79 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है. उत्तर प्रदेश में भी सरसों की खेती लगातार मजबूत हो रही है और इस बार रकबा बढ़कर करीब 16.99 लाख हेक्टेयर हो गया है.

मौसम ने अब तक निभाया है साथ

इस सीजन में अब तक मौसम सरसों के लिए अनुकूल बना हुआ है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, ठंड का संतुलन सही रहा है और अब तक पाले की कोई गंभीर रिपोर्ट सामने नहीं आई है. पाला सरसों की पैदावार के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है, ऐसे में इसका न होना किसानों के लिए राहत की बात है.

भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि फसल की बढ़वार अच्छी है और पौधों में दाने बनने की प्रक्रिया सही दिशा में आगे बढ़ रही है. खेतों में पौधे हरे-भरे हैं और अब तक किसी बड़े रोग या कीट प्रकोप की खबर नहीं मिली है.

बारिश और ओलावृष्टि बनी चिंता का कारण

हालांकि, आने वाले दिनों में मौसम को लेकर थोड़ी चिंता जरूर जताई जा रही है. मौसम विभाग के अनुसार, उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में बारिश और ओलावृष्टि की संभावना है. जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ इलाकों में तेज हवाओं, गरज-चमक और ओले गिरने की आशंका जताई गई है.

अगर यह गतिविधि सीमित और हल्की रही, तो फसल को ज्यादा नुकसान नहीं होगा. लेकिन यदि ओलावृष्टि ज्यादा हुई, तो फूल और फलियों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे पैदावार पर असर पड़ने की आशंका बनी रहेगी.

उत्पादन लक्ष्य को लेकर सरकार आशावान

पिछले साल देश में सरसों का कुल उत्पादन करीब 126.67 लाख टन रहा था. इस बार सरकार ने 2025-26 के लिए लगभग 139 लाख टन का लक्ष्य तय किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम ने आखिरी चरण तक साथ दिया, तो यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

सरसों की बेहतर पैदावार न सिर्फ किसानों की आमदनी बढ़ाएगी, बल्कि खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता घटाने में भी मदद करेगी. सरकार पहले से ही देश में तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है, ताकि विदेशी तेलों पर खर्च कम किया जा सके.

कुछ राज्यों में गिरावट भी चिंता का विषय

जहां एक ओर बड़े राज्यों में रकबा बढ़ा है, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों और झारखंड जैसे इलाकों में सरसों की खेती में कमी दर्ज की गई है. विशेषज्ञों के मुताबिक, नवंबर में हुई असामान्य बारिश के कारण कई किसानों की बुवाई प्रभावित हुई. देर से बुवाई होने पर फसल को ज्यादा तापमान और कीटों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे किसान जोखिम नहीं लेना चाहते.

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