ओडिशा के अंगुल जिले के एक महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) ने कृषि निर्यात के क्षेत्र में नई मिसाल कायम की है. जिले के मां कालिजई स्वयं सहायता समूह ने 7.5 क्विंटल आम्रपाली आम का निर्यात लंदन भेजा है. इस उपलब्धि को राज्य में महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण उद्यमिता और कृषि निर्यात के बढ़ते दायरे के रूप में देखा जा रहा है.
आमतौर पर कृषि उत्पादों के बड़े पैमाने पर निर्यात की जिम्मेदारी किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के पास होती है, क्योंकि उनके पास बाजार से जुड़ाव, संग्रहण क्षमता और संस्थागत ढांचा अपेक्षाकृत मजबूत होता है. इसके विपरीत स्वयं सहायता समूहों को अब तक छोटे स्तर की आर्थिक गतिविधियों तक सीमित माना जाता रहा है. ऐसे में किसी एसएचजी का अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है.
ओडिशा से इस साल अब तक 90 मीट्रिक टन आम का निर्यात
इस निर्यात को राज्य के कृषि एवं किसान सशक्तिकरण विभाग के अंतर्गत उद्यानिकी निदेशालय का सहयोग मिला. यह पहल उत्पादक संगठन और किसान उत्पादक संगठन (पीएसएफपीओ) परियोजना के तहत आगे बढ़ाई गई. राज्य सरकार के अनुसार ओडिशा से इस वर्ष अब तक लगभग 90 मीट्रिक टन आम का निर्यात हो चुका है. हालांकि मां कालिजई एसएचजी द्वारा किया गया यह निर्यात इसलिए खास है क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्रामीण महिलाओं की वैश्विक बाजार में भागीदारी का उदाहरण बनकर सामने आया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी कृषि उत्पाद को निर्यात के लिए तैयार करना केवल उत्पादन तक सीमित नहीं होता. इसके लिए गुणवत्ता मानकों का पालन, छंटाई, पैकिंग, संग्रहण और बाजार से जुड़ी कई प्रक्रियाओं को पूरा करना पड़ता है. ऐसे में एक स्वयं सहायता समूह का इन सभी मानकों पर खरा उतरना उसकी बढ़ती क्षमता और संगठनात्मक मजबूती को दर्शाता है.
ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक संभावनाएं खुलने के नए अवसर
इस उपलब्धि का एक बड़ा पहलू यह भी है कि इससे यह धारणा बदलती दिख रही है कि केवल बड़े उत्पादक संगठन ही निर्यात कर सकते हैं. अब छोटे ग्रामीण समूह भी सही मार्गदर्शन और बाजार तक पहुंच मिलने पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हिस्सा बन सकते हैं. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में नई आर्थिक संभावनाएं खुलने की उम्मीद है.
मां कालिजई एसएचजी की सदस्य रुपाली प्रधान ने कहा कि समूह की महिलाओं ने कभी नहीं सोचा था कि उनके गांव में पैदा हुए आम विदेशों तक पहुंचेंगे. उनके अनुसार यह उपलब्धि केवल आम के निर्यात की नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मविश्वास, सामूहिक प्रयास और आर्थिक आत्मनिर्भरता की कहानी है.
कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस तरह की पहल ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ–साथ राज्य के कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में भी मदद करेंगी. साथ ही यह अन्य स्वयं सहायता समूहों को भी कृषि आधारित उद्यमों और निर्यात गतिविधियों से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकती हैं. मां कालिजई एसएचजी की यह सफलता दिखाती है कि उचित प्रशिक्षण, संस्थागत सहयोग और बाजार तक पहुंच मिलने पर छोटे ग्रामीण समूह भी वैश्विक व्यापार का हिस्सा बन सकते हैं.