मूली की फसल को बचाना है तो रहें सतर्क, इन रोगों से हो सकता है भारी नुकसान…यहां जानें समाधान

मूली की खेती में वैसे तो रोगों का खतरा ज्यादा नहीं होता, लेकिन नमी ज्यादा होने, लगातार कोहरा रहने, खेत में पानी रुकने या बीज और मिट्टी की सही देखभाल न होने पर रोग तेजी से फैलते हैं. कई बार किसान शुरुआत में हल्के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और जब तक ध्यान जाता है, तब तक नुकसान काफी हो चुका होता है.

नई दिल्ली | Published: 16 Jan, 2026 | 12:26 PM

Radish farming: सब्जियों में मूली ऐसी फसल मानी जाती है, जिसे कम समय में तैयार कर किसान अच्छी आमदनी कमा सकते हैं. इसकी खेती आसान होती है और ज्यादातर किसान इसे गेहूं, सरसों या अन्य रबी फसलों के साथ उगा लेते हैं. मूली स्वाद के साथ-साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद है, इसलिए बाजार में इसकी मांग बनी रहती है. लेकिन कई बार लापरवाही या मौसम के बदलाव के कारण मूली की फसल में कुछ खतरनाक रोग और कीट लग जाते हैं, जो देखते-देखते पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. अगर समय रहते इनकी पहचान और इलाज न किया जाए, तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ता है.

मूली की फसल में रोग क्यों लगते हैं

मूली की खेती में वैसे तो रोगों का खतरा ज्यादा नहीं होता, लेकिन नमी ज्यादा होने, लगातार कोहरा रहने, खेत में पानी रुकने या बीज और मिट्टी की सही देखभाल न होने पर रोग तेजी से फैलते हैं. कई बार किसान शुरुआत में हल्के लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं और जब तक ध्यान जाता है, तब तक नुकसान काफी हो चुका होता है. इसलिए जरूरी है कि फसल की नियमित निगरानी की जाए.

माहू कीट से कैसे पहचानें नुकसान

मूली की फसल में माहू एक आम लेकिन खतरनाक कीट है. ये छोटे-छोटे हरे या सफेद रंग के कीट पत्तियों के नीचे चिपक जाते हैं और उनका रस चूसने लगते हैं. शुरुआत में पत्तियां हल्की पीली दिखने लगती हैं, लेकिन धीरे-धीरे पौधा कमजोर हो जाता है. माहू के कारण पत्तियों पर चिपचिपा पदार्थ भी दिख सकता है, जिससे फसल की बाजार में कीमत गिर जाती है.

माहू से बचाव के लिए खेत को साफ रखना बहुत जरूरी है. अगर शुरुआती अवस्था में इसका असर दिखे, तो नीम गिरी से बने घोल का छिड़काव करना फायदेमंद रहता है. ज्यादा प्रकोप होने पर उचित कीटनाशक का इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए.

रोयेंदार सुंडी से फसल को कैसे बचाएं

रोयेंदार सुंडी मूली की पत्तियों को तेजी से खा जाती है. ये कीट झुंड में रहते हैं और थोड़े ही समय में पत्तियों को जालीदार बना देते हैं. इससे पौधा भोजन नहीं बना पाता और बढ़वार रुक जाती है. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो पूरी क्यारी खराब हो सकती है.

इससे बचाव के लिए खेत में अंडों और सुंडियों को दिखते ही नष्ट करना चाहिए. जरूरत पड़ने पर निर्धारित अंतराल पर दवा का छिड़काव किया जा सकता है, जिससे इनकी संख्या को काबू में रखा जा सके.

अल्टरनेरिया झुलसा रोग से घटती है पैदावार

अल्टरनेरिया झुलसा रोग अधिकतर ठंड और नमी वाले मौसम में फैलता है. इस रोग में मूली की पत्तियों पर गोल-गोल काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं. धीरे-धीरे ये धब्बे बढ़ते हैं और पूरी पत्ती को सुखा देते हैं. इससे जड़ का विकास भी रुक जाता है और उपज कम हो जाती है.

इस रोग से बचाव के लिए बीज बोने से पहले बीजोपचार बहुत जरूरी है. संक्रमित पत्तियों को तुरंत तोड़कर खेत से बाहर निकाल देना चाहिए. साथ ही समय-समय पर फफूंदनाशक दवाओं का छिड़काव करने से रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

मोयला या चेपा से कैसे करें बचाव

मोयला या चेपा भी मूली की पत्तियों का रस चूसता है. इसके कारण पौधे की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियों में पीलापन आ जाता है. यह कीट अक्सर जनवरी-फरवरी के समय ज्यादा सक्रिय रहता है.

इससे बचने के लिए शुरुआत में ही प्रभावित हिस्सों को हटाना जरूरी है. जैविक उपाय के तौर पर नीम आधारित घोल काफी असरदार रहता है. अधिक प्रकोप की स्थिति में ही रासायनिक दवाओं का सहारा लेना चाहिए.

अल्टरनेरिया पर्ण चित्ती रोग से रहें सावधान

इस रोग में पौधे की पत्तियों और तनों पर छोटे-छोटे काले धब्बे बनते हैं, जो धीरे-धीरे पूरे पौधे को कमजोर कर देते हैं. जड़ सड़ने लगती है और पौधा मुरझा जाता है. यह रोग खेत में गंदगी और अधिक नमी के कारण तेजी से फैलता है.

इससे बचाव के लिए खेत को खरपतवार-मुक्त रखना जरूरी है. बीज हमेशा उपचारित ही बोएं और जरूरत पड़ने पर उचित दवाओं का छिड़काव करें.

सावधानी ही है सबसे बड़ा बचाव

मूली की फसल को रोगों से बचाने के लिए सबसे जरूरी है समय पर निगरानी, सही सिंचाई और संतुलित खाद का उपयोग. अगर किसान शुरुआत में ही लक्षण पहचान लें और सही उपाय अपनाएं, तो मूली की फसल न सिर्फ सुरक्षित रहती है बल्कि बेहतर उत्पादन और अच्छी कमाई भी देती है.

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