नए बीज विधेयक होगा हाईटेक! जीन एडिटिंग को मिल सकती है मंजूरी, फसल सुधार की बढ़ेगी रफ्तार
केंद्र सरकार नए बीज विधेयक में जीन एडिटिंग तकनीक को शामिल करने पर विचार कर रही है. इस बीच GM बीजों को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं. ASSOCHAM और कृषि विशेषज्ञ आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने की वकालत कर रहे हैं, जबकि भारतीय किसान संघ ने ट्रांसजेनिक बीजों का विरोध किया है.
केंद्र सरकार नए बीज विधेयक (Seed Bill) में जीन एडिटिंग (Gene Editing) तकनीक को शामिल कर सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार उनकी सिफारिशें मानती है, तो इस तकनीक का उल्लेख सीधे बिल या इसके नियमों में किया जा सकता है. इसका उद्देश्य जीएम (GM) फसलों को लेकर पहले हुए विवादों जैसी स्थिति से बचना है. भारत में वर्ष 2002 में केवल बीटी कपास (Bt Cotton) को व्यावसायिक खेती की अनुमति मिली थी. इसके बाद किसी भी खाद्य फसल की जीएम खेती को मंजूरी नहीं दी गई.
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार ने नया बीज विधेयक तैयार कर लिया है और अब इसे संसद में पेश करने के लिए राजनीतिक मंजूरी का इंतजार है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान पहले ही कह चुके हैं कि सीड बिल और पेस्टिसाइड मैनेजमेंट बिल दोनों संसद में पेश करने के लिए तैयार हैं. नवंबर 2025 में सीड बिल का मसौदा सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया गया था, जिस पर कृषि मंत्रालय को 30 दिनों के भीतर 14,000 से अधिक सुझाव मिले थे.
भारतीय किसान संघ ने जताई आपत्ति
हालांकि, कहा जा रहा है कि सरकार के लिए जीन एडिटिंग से जुड़े सभी सुझावों को स्वीकार करना आसान नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े भारतीय किसान संघ (BKS) ने सीड बिल के मसौदे में शामिल ‘ट्रांसजेनिक’ शब्द पर आपत्ति जताई है. सरकार को भेजे अपने सुझावों में भारतीय किसान संघ ने मांग की है कि बिल से ‘ट्रांसजेनिक’ शब्द को हटाया जाए. संगठन का कहना है कि किसी भी प्रकार के ट्रांसजेनिक या आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) बीजों को कानून में शामिल नहीं किया जाना चाहिए.
नई तकनीकों को तेजी से अपनाने की सिफारिश
द्योग संगठन ASSOCHAM और Grant Thornton Bharat की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र में जीन एडिटिंग समेत नई तकनीकों को तेजी से अपनाने की सिफारिश की गई है. “Seeds of Progress: Advancing Global Trade, Innovation and Sustainable Agriculture” नामक रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग, जीन एडिटिंग, स्पीड ब्रीडिंग, डिजिटल फेनोटाइपिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से नई फसल किस्में विकसित करने में लगने वाला 10-15 साल का समय कम किया जा सकता है.
कपास आयात पर चिंता जताई
वहीं, ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के संस्थापक अध्यक्ष और ICAR के पूर्व महानिदेशक आर.एस. परोड़ा ने बढ़ते कपास आयात पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि भारत कभी दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक था, लेकिन अब आयात पर निर्भरता बढ़ रही है. उनका मानना है कि उत्पादकता बढ़ाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा दोबारा हासिल करने के लिए वैज्ञानिक आधार पर अगली पीढ़ी की GM तकनीकों को अपनाने और स्पष्ट दीर्घकालिक नीति बनाने की जरूरत है.
जीन एडिटिंग और आधुनिक ब्रीडिंग तकनीकों को बढ़ावा
ASSOCHAM की रिपोर्ट में जीएम (GM) तकनीक का सीधे उल्लेख नहीं किया गया, लेकिन जीन एडिटिंग और आधुनिक ब्रीडिंग तकनीकों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत को वैश्विक बीज बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहना है, तो मॉलिक्यूलर ब्रीडिंग, बायोटेक्नोलॉजी, डिजिटल ब्रीडिंग टूल्स और जलवायु-अनुकूल बीजों में निवेश बढ़ाना होगा.
उच्च स्तरीय गोलमेज बैठक आयोजित
इसी मुद्दे पर 26 जुलाई को TAAS, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) ने एक उच्च स्तरीय गोलमेज बैठक आयोजित की. बैठक में जीएम (GM) और जीनोम एडिटेड (GE) फसलों के नियमन और मंजूरी पर चर्चा हुई. हालांकि, इस बैठक पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति बाद में इस विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए वापस ले ली गई.