पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 90 प्रतिशत की कमी, सरकार ने खर्च किए 4,237 करोड़
सरकार किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए आर्थिक सहायता भी दे रही है. योजना के तहत किसानों को मशीनरी खरीदने पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है. इसके अलावा कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने के लिए किसान समूहों, सहकारी समितियों और पंचायतों को 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जा रही है.
Stubble burning: उत्तर भारत में हर साल सर्दियों के दौरान बढ़ते प्रदूषण का एक बड़ा कारण पराली जलाना रहा है. लेकिन अब इस समस्या पर काफी हद तक काबू पाया जाता दिख रहा है. केंद्र सरकार के लगातार प्रयासों और राज्यों के सहयोग से पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है.
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने लोकसभा में जानकारी दी कि सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के कारण 2025 में पराली जलाने की घटनाओं में 2022 के मुकाबले 90 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है. यह बदलाव न केवल पर्यावरण के लिए बल्कि किसानों के लिए भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
सरकार ने किया बड़ा निवेश
पराली की समस्या को खत्म करने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर निवेश किया है. मंत्री के अनुसार 2018-19 से लेकर 10 मार्च 2026 तक कुल 4,237.47 करोड़ रुपये इस दिशा में खर्च किए गए हैं.
इस राशि का उपयोग किसानों को आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराने, जागरूकता बढ़ाने और वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए किया गया है. सरकार का उद्देश्य है कि किसान पराली जलाने की बजाय उसे खेत में ही उपयोग कर सकें या अन्य तरीकों से उसका सही इस्तेमाल करें.
किसानों को दी जा रही आर्थिक मदद
सरकार किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए आर्थिक सहायता भी दे रही है. योजना के तहत किसानों को मशीनरी खरीदने पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है. इसके अलावा कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने के लिए किसान समूहों, सहकारी समितियों और पंचायतों को 80 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जा रही है. इससे छोटे और सीमांत किसान भी आसानी से मशीनों का उपयोग कर पा रहे हैं.
अब तक देश में 3.53 लाख से अधिक मशीनें किसानों को वितरित की जा चुकी हैं और 43,535 से ज्यादा कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए गए हैं. इससे खेतों में पराली प्रबंधन आसान हो गया है.
इन-सीटू और एक्स-सीटू प्रबंधन पर जोर
सरकार पराली जलाने की बजाय उसके बेहतर उपयोग पर जोर दे रही है. इसके लिए दो प्रमुख तरीके अपनाए जा रहे हैंइन-सीटू और एक्स-सीटू प्रबंधन.
इन-सीटू प्रबंधन में फसल अवशेष को खेत में ही मिलाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है. वहीं एक्स-सीटू प्रबंधन में पराली का उपयोग बायोमास, ईंधन या अन्य औद्योगिक कार्यों में किया जाता है. इसके लिए किसानों को आधुनिक मशीनें जैसे ट्रैक्टर, बेलर, कटर और लोडर उपलब्ध कराए जा रहे हैं. सरकार इस दिशा में 1.50 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं पर 65 प्रतिशत तक सहायता भी दे रही है.
सख्त नियम और निगरानी व्यवस्था
पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए सरकार ने नियमों को भी सख्त किया है. वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं. इनमें छोटे किसानों के लिए मशीनें मुफ्त उपलब्ध कराना, ईंट भट्टों में बायोमास के उपयोग को अनिवार्य करना और नियमों का पालन न करने पर कार्रवाई शामिल है.
इसके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने निगरानी के लिए 31 फ्लाइंग स्क्वाड तैनात किए, जो 1 अक्टूबर से 30 नवंबर 2025 के बीच पंजाब और हरियाणा के संवेदनशील क्षेत्रों में सक्रिय रहे.
तकनीक से हो रही निगरानी
पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए अब आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जा रहा है. उपग्रह रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए खेतों में लगने वाली आग की निगरानी की जाती है.
यह प्रणाली ICAR-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित प्रोटोकॉल के आधार पर काम करती है, जिससे सटीक आंकड़े मिलते हैं और समय पर कार्रवाई संभव होती है.
पर्यावरण और किसानों दोनों को फायदा
विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने में कमी आने से न केवल वायु प्रदूषण कम हुआ है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है. साथ ही किसानों को भी वैकल्पिक तरीकों से अतिरिक्त आय के अवसर मिल रहे हैं.
सरकार का मानना है कि अगर इसी तरह प्रयास जारी रहे तो आने वाले वर्षों में पराली जलाने की समस्या पूरी तरह खत्म हो सकती है. यह पहल पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ खेती की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो रही है.