क्या सुप्रीम कोर्ट से पूरी होगी धरती की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली की उम्मीद? पढ़ें डिटेल्स
धरती की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली पर्वतमाला पर पहले से ही ‘विकास का ग्रहण’ लगा हुआ है. इस बीच खनन संबंधी नियमों की एकरूपता के दायरे में अरावली को लाने की केंद्र सरकार की पहल को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 नवंबर को मंजूर करने के बाद से ही इसके वजूद पर संकट के बादल मंडराने लगे.
अरावली की पर्वत मालाएं महज पत्थरों का विशाल समूह मात्र नहीं है. इसका जितना भौगोलिक और पर्यावरणीय महत्व है, उससे कहीं ज्यादा सामाजिक और आर्थिक महत्व है. अरावली के बहुउद्देशीय महत्व के बीच इसके आर्थिक पहलू ने ही सबसे बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. आज के अर्थ युग में अरावली से महज मुठ्ठी भर लोगों को खनन के नाम पर भारी कमाई ही नहीं हो रही है, बल्कि 700 किमी से ज्यादा लंबाई में विस्तृत इस पर्वतमाला के आगोश में इंसानी बस्तियों की भरी-पूरी आजीविका भी चलती है. यही वजह है कि असंख्य लोगों की भावनाएं अरावली के साथ सदियों से जुड़ी हैं. इन्हीं जज्बातों को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अरावली के मामले में चल रहे जन आंदोलनों पर स्वत: संज्ञान लिया है. देश की शीर्ष अदालत ने नियमों की भूल-भुलैया में फंसी अरावली को फौरी तौर पर राहत तो दे दी है, लेकिन ये राहत फिलहाल स्थायी नहीं है.
धरती की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में शुमार अरावली पर्वतमाला पर पहले से ही ‘विकास का ग्रहण’ लगा हुआ है. इस बीच खनन संबंधी नियमों की एकरूपता के दायरे में अरावली को लाने की केंद्र सरकार की पहल को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 नवंबर को मंजूर करने के बाद से ही इसके वजूद पर संकट के बादल मंडराने लगे. अरावली के अस्तित्व से जुड़े मामले में सियासी दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक, विभिन्न वर्गों ने मुखर आवाज उठाई. समाज द्वारा साझा किए गए अरावली के दर्द को सरकार ने भले ही अनसुना कर दिया हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर संवेदना के साथ स्वत: संज्ञान लेकर अपने ही पूर्व आदेश को स्थगित कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की खंडपीठ ने 20 नवंबर के अपने आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए मुकर्रर की गई तारीख 21 जनवरी 2026 तक के लिए स्थगन आदेश जारी किया है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को केंद्र सरकार द्वारा अरावली के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई नियमावली को स्वीकृत किया था. इसमें जिस एक नियम को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हो रहा है, उसके तहत अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा मानने की बात कही गई है. इसका विरोध कर रहे जानकारों की दलील है कि इस नियम के लागू होने के बाद अरावली कुछ ही सालों में अपना 90 फीसदी तक वजूद खो देगी. दलील यह भी दी जा रही है कि सरकार ने यह नियम अरावली क्षेत्र में खनन की खुली छूट देने के लिए ही बनाया है. क्योंकि, अरावली क्षेत्र में महज 10 से 15 फीसदी पहाड़ियां ही 100 मीटर से ऊंची हैं.
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इस बीच शीर्ष अदालत ने इस मामले में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करने को भी कहा है. यह समिति अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को तय करने के लिए पहले से बनी सभी समितियों की सिफारिशों का आकलन करके इस दिशा में समेकित सुझाव देगी. अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से भी कहा है कि वे प्रस्तावित समिति की संरचना समेत इस मामले से जुड़े अन्य पहलुओं पर निर्णय लेने में अदालत की सहायता करें.
खनन और खेती, दोनों से है परेशानी
दरअसल अरावली के वजूद को लेकर उभरे संकट का यह एकमात्र मामला नहीं है. मौजूदा विवाद अरावली के स्वरूप को परिभाषित करने के लिए बनाए गए नियमों में विसंगति से जरूर जुड़ा है, लेकिन पिछले दो दशक से अरावली क्षेत्र में चल रहे बेतहाशा खनन और खेती सहित अन्य इंसानी जरूरतों के लिए अरावली वन क्षेत्र को उजाड़ने और इससे वन्य जीवन को हो रहे नुकसान का मुद्दा पहले से ही सुर्खियों में रहा है. कुल मिलाकर व्यापक परिप्रेक्ष्य में अगर देखें तो यह अरावली के मूल स्वरूप को नष्ट करने का मामला है. इसमें खनन की भूमिका बाद में शामिल हुई. इससे पहले अरावली से जुड़े व्यापक भूभाग में सहस्राब्दियों से पनप रही इंसानी बस्तियां इसके मूल स्वरूप को प्रभावित करने वाले शुरुआती कारक बनी हैं. स्वाभाविक है कि इन बस्तियों का मूल काम खेती के लिए जंगलों को साफ करके खेत बनाना रहा है. हालांकि खेती और खनन को एक नजरिए से नहीं देखा जा सकता है. खेती, प्रकृति के साथ तालमेल कायम करते हुए आजीविका के साधन विकसित करने वाली एक संतुलित गतिविधि है. वहीं, खनन से सिर्फ और सिर्फ प्रकृति को नुकसान होता है तथा खनन से जुड़े मुठ्ठी भर लोगों की अकूत दौलत जुटाने की हवस पूरी होती है. सुप्रीम कोर्ट अरावली से जुड़े मामले में पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं पर सुनवाई के दौरान इस विषय पर भी विचार करेगी. इसका केंद्र बिंदु संतुलित विकास बनाम विनाश की ओर ले जाता विकास होगा.
अरावली को सबने लूटा
अरावली से जुड़ा यह सर्वमान्य तथ्य है कि इससे जुड़े राज्यों (दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात) और केंद्र में सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, अरावली क्षेत्र में गैर-जरूरी इंसानी दखल पर नकेल कसने को लेकर सभी सरकारों का रवैया नकारात्मक ही रहा है. इसके पीछे विकास के नाम पर हो रहे विनाश के एवज में अकूत दौलत का खेल एक बड़ी वजह रही है. समूचे अरावली क्षेत्र को इसकी कीमत अपने वजूद को संकट में डालकर चुकानी पड़ रही है.
हालांकि अदालत से लेकर शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र इस दिशा में समूचे सिस्टम को समय-समय पर आगाह जरूर करते रहे हैं. इसकी मदद से समाज में अरावली को लेकर संवेदनशील बनने की अलख जगी है. इसी का नतीजा आज उभर रहा सामाजिक दखल है, जिसके बलबूते ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लिया है. इसके पीछे केवल सामाजिक चेतना ही नहीं, बल्कि शिक्षा जगत ने भी अपने अध्ययन और शोध के जरिए सोए हुए सिस्टम को जगाने में अहम भूमिका निभाई है.
शोध ने किया आगाह
हाल ही में प्रकाशित हुए एक शोध में दो टूक चेतावनी दी गई कि अरावली के पर्यावास पर अगर मौजूदा गति से इंसानी गतिविधियों का कुठाराघात होता रहा तो साल 2059 तक यह पर्वतमाला अपने मूल स्वरूप को खो देगी. गौरतलब है कि अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है. अब तक हुए वैज्ञानिक शोधों में पता चला है कि इसका निर्माण करीब 2.5 अरब साल पहले हुआ था. शोधकर्ताओं ने हाल ही में आगाह किया कि वर्ष 2059 तक अरावली क्षेत्र में मानव बस्तियों का विस्तार इस हद तक हो जाएगा कि इसका करीब 16,360 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र खत्म हो जाएगा. राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक खनन, शहरीकरण और कृषि में विस्तार के कारण हो रहा यह बदलाव उत्तर-पश्चिम भारत के पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह से कमजोर कर सकता है.
विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर लक्ष्मी कांत शर्मा और आलोक राज के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में 1975 से 2019 के दौरान 44 वर्षों में जुटाए गए सैटेलाइट डेटा और मशीन लर्निंग आधारित मॉडल के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया. गूगल अर्थ इंजन और टेरेसेट लैंड चेंज मॉड्यूलर की मदद से शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की है कि अरावली क्षेत्र में हुए इंसानी दखल से अब तक कितना नुकसान हो चुका है. साथ ही आने वाले चार दशकों में इसका क्या असर हो सकता है.
इस अध्ययन के नतीजे काफी चिंताजनक हैं. इसमें बताया गया कि 1975 से 2019 के बीच अरावली क्षेत्र में करीब 5,772 वर्ग किमी क्षेत्रफल में वन क्षेत्र पूरी तरह खत्म हो गया है. यह अरावली के कुल वन क्षेत्र का लगभग 7.6 प्रतिशत हिस्सा है. इतना ही नहीं, इस अवधि में करीब 3,676 वर्ग किमी इलाका बंजर भूमि में तब्दील हुआ. साथ ही अरावली क्षेत्र में लगभग 777 वर्ग किमी क्षेत्रफल में मानव बस्तियां बस गईं. इससे स्पष्ट है कि अरावली की पहाड़ियों और घाटियों पर धीरे-धीरे मानव गतिविधियों का दबाव बढ़ता जा रहा है.
प्रो. लक्ष्मी कांत शर्मा का कहना है कि सैटेलाइट डेटा से यह स्पष्ट होता है कि बीते 4 दशकों में ऊपरी, मध्य और निचले अरावली क्षेत्रों में जमीन के इस्तेमाल में बड़े बदलाव हुए हैं. उन्होंने इससे भविष्य में होने वाला संभावित नुकसान और भी ज्यादा गंभीर रहने की आशंका से इनकार नहीं किया है. अध्ययन के मुताबिक, अगर यही हालात बदस्तूर जारी रहे तो 2059 तक अरावली क्षेत्र का करीब 16,360 वर्ग किमी वन क्षेत्र सीधे तौर पर मानव बस्तियों में बदल सकता है. यह अरावली के कुल वन क्षेत्र का लगभग 21.6 प्रतिशत होगा. इसके अलावा जंगलों का कुछ हिस्सा खेती, खनन और बंजर भूमि में भी तब्दील होगा, लेकिन इस क्षेत्र में सबसे तेजी से विस्तार इंसानी बस्तियों का होगा.
अदालत से उम्मीद
यह बात पूरी तरह से याद रखने योग्य है कि दिल्ली-एनसीआर से लेकर उदयपुर और सिरोही तक शहरी विस्तार, खनन और सड़क जैसी बुनियादी संरचनाएं अरावली के उस इकोलॉजिकल कॉरिडोर को काट रही हैं, जो महज 50 साल पहले बहुत व्यापक पैमाने पर सघन वन क्षेत्र हुआ करता था. शोध में यह भी पता चला है कि वन क्षेत्र में बस्तियां बनाने, जमीन बंजर होने तथा बंजर भूमि पर भी बस्तियां बसने की प्रक्रिया बहुत तेज गति से लगातार चल रही है. यह रियल एस्टेट, उद्योग और शहरों के आसपास फैलते निर्माण कार्यों के दबाव को भी दर्शाता है. प्रो. शर्मा का दावा है कि आने वाले दशकों में भी अरावली के वन क्षेत्र में गिरावट जारी रहेगी. इससे जल संरक्षण, जलवायु संतुलन और जैव विविधता जैसे अरावली के खास इको-सिस्टम पर गहरा असर पड़ेगा.
ऐसे में देश की शीर्ष अदालत ने जब इस मामले में स्वत: संज्ञान लेकर पूरे मामले की फिर से सुनवाई करने का स्वागत योग्य फैसला किया है, तब अदालत को इस तरह की अध्ययन रिपोर्ट पर भी गंभीरता से संज्ञान लेने की जरूरत है. अदालत से उम्मीद है कि इस मामले में पूरी तरह से वैज्ञानिक नजरिया अपनाकर एक ऐसा फैसला किया जाए, जो सभी पक्षकारों के लिए सतत, संतुलित एवं संतोषप्रद साबित हो. आखिरकार यह सिर्फ अरावली के अस्तित्व का सवाल नहीं है. इस मामले में अदालत का फैसला पूरे देश में अरावली की तर्ज पर कुदरत के दूसरे अन्य गहनों को लूटने की चल रही कवायद पर नकेल कसने का काम करेगा. इसलिए समाज और सरकार सहित सभी पक्षकारों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस बार सुप्रीम कोर्ट से अरावली के नाम पर समूची कायनात को कोई स्थायी राहत मिल पाएगी?