रिलीज से पहले विवादों में काजल अग्रवाल की फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’, कीटनाशक उद्योग ने उठाए कई सवाल
The India Story: 24 जुलाई को रिलीज होने वाली फिल्म 'द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस' को लेकर विवाद शुरू हो गया है. एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) ने फिल्म के ट्रेलर में कीटनाशकों और कैंसर से जुड़े दावों को वैज्ञानिक आधारहीन बताते हुए सीबीएफसी से इसकी जांच की मांग की है.
The India Story Film: भारत में खेती और कीटनाशकों के इस्तेमाल पर बनी फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस…’ रिलीज से पहले ही चर्चा में आ गई है. यह फिल्म 24 जुलाई को सिनेमाघरों में आने वाली है, लेकिन इसके ट्रेलर को लेकर कीटनाशक उद्योग ने गंभीर आपत्ति जताई है. फिल्म में दावा किया गया है कि फलों और सब्जियों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक लोगों में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की बड़ी वजह बन रहे हैं. इन दावों के बाद कृषि और कीटनाशक क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने इसे लेकर चिंता जताई है.
ट्रेलर की जांच की मांग
कीटनाशक उद्योग के संगठन एग्रो केम फेडरेशन ऑफ इंडिया (ACFI) ने इस मामले में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को पत्र लिखकर फिल्म के ट्रेलर की विस्तार से जांच करने की मांग की है. फेडरेशन का कहना है कि फिल्म में आधुनिक खेती और कीटनाशकों को कैंसर, मौत और खाद्य सुरक्षा के संकट से जोड़ने वाले कई दावे किए गए हैं, लेकिन उनके समर्थन में कोई वैज्ञानिक प्रमाण या विश्वसनीय सोर्स नहीं दिखाया गया है.
किन दावों पर उठे सवाल?
एसीएफआई ने ट्रेलर में दिखाए गए कई आंकड़ों पर सवाल खड़े किए हैं. इनमें यह दावा शामिल है कि भारत में लोगों को हर साल 50 हजार टन से ज्यादा कीटनाशक ‘खिलाए’ जा रहे हैं, हर तीन में से एक परिवार कैंसर से प्रभावित है, हर 60 सेकंड में एक से दो लोगों की मौत हो रही है और कीटनाशकों के कारण हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों की जान चली जाती है. फेडरेशन का कहना है कि इतने गंभीर दावों को तथ्यों की तरह पेश किया गया है, जबकि इनके पीछे कोई वैज्ञानिक अध्ययन, शोध या आधिकारिक स्रोत नहीं बताया गया.
उद्योग ने पेश किए आधिकारिक आंकड़े
अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए एसीएफआई ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़ों का हवाला दिया है. फेडरेशन के अनुसार, खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में सालाना लगभग 40,094 टन कीटनाशकों का उपयोग होता है, जो ट्रेलर में बताए गए आंकड़ों से अलग है. वहीं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अध्ययनों के अनुसार देश में उत्पादित 96.5 प्रतिशत से अधिक कृषि उत्पाद तय कीटनाशक अवशेष (MRL) मानकों के भीतर पाए गए हैं. यानी अधिकांश कृषि उत्पाद निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करते हैं.
WHO और NCRB के आंकड़ों का भी दिया हवाला
फेडरेशन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट का भी जिक्र किया. उसके अनुसार कैंसर के प्रमुख कारण तंबाकू, शराब, रेडिएशन, एस्बेस्टस और आर्सेनिक जैसे कारक हैं. रिपोर्ट में कृषि उत्पादों को कैंसर का सीधा कारण नहीं बताया गया है.
इसके अलावा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में कीटनाशक विषाक्तता से जुड़ी 41,818 मौतें दर्ज हुईं, जिनमें 7,821 मामले गलती से कीटनाशक निगलने से जुड़े थे. फेडरेशन का कहना है कि इन आंकड़ों को सही संदर्भ के बिना प्रस्तुत करने से लोगों में भ्रम फैल सकता है.
किसानों और निर्यात पर पड़ सकता है असर
एसीएफआई का कहना है कि अगर भारतीय खाद्य उत्पादों को बिना ठोस वैज्ञानिक आधार के ‘धीमा जहर’ बताया जाएगा, तो इसका असर सिर्फ उपभोक्ताओं पर ही नहीं बल्कि किसानों पर भी पड़ेगा. इससे भारतीय कृषि उत्पादों की छवि खराब हो सकती है और कृषि निर्यात पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है. फेडरेशन का मानना है कि भारत के खाद्य सुरक्षा मानकों और नियामक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा भी कमजोर हो सकता है.
फेडरेशन ने साफ किया कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करता है, लेकिन जन स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर बनने वाली फिल्मों में तथ्यों और वैज्ञानिक प्रमाणों का होना जरूरी है.