बेमौसम बारिश से देशभर में फसल नुकसान का दायरा बढ़ा, इन राज्यों में हालात सबसे खराब

पहले प्री-मानसून नुकसान मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहता था. लेकिन अब इसका दायरा तेजी से बढ़ रहा है. 2026 में महाराष्ट्र एक बड़ा हॉटस्पॉट बनकर उभरा है, जहां मार्च महीने में ही 1.2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा फसल प्रभावित हुई.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 10 Apr, 2026 | 01:37 PM

Crop damage: भारत में खेती लंबे समय से मानसून पर निर्भर रही है, और आमतौर पर यही माना जाता था कि फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान बरसात के मौसम में होता है. लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं. हालिया विश्लेषण से यह साफ हो गया है कि अब सिर्फ मानसून ही नहीं, बल्कि मार्च और अप्रैल का प्री-मानसून समय भी किसानों के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है.

बदलता मौसम और बढ़ता खतरा

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों को देखें तो साफ पता चलता है कि खेती के लिए जोखिम का समय बदल गया है. पहले जहां जून से सितंबर के बीच भारी बारिश और बाढ़ से फसलें खराब होती थीं, वहीं अब मार्च और अप्रैल में ही बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि किसानों की मेहनत पर पानी फेर रही है.

अब मार्च-अप्रैल भी बन गया नुकसान का मौसम

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से लेकर 2026 तक के आंकड़ों में यह ट्रेंड लगातार मजबूत होता दिख रहा है. खासकर 2022, 2024 और 2025 में प्री-मानसून सीजन के दौरान बड़े स्तर पर फसल नुकसान दर्ज किया गया. अब 2026 में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है, जो चिंता बढ़ाने वाली है.

प्री-मानसून का कहर, 6 लाख हेक्टेयर से ज्यादा फसल बर्बाद, pc-AI

2026 में तेजी से बढ़ा नुकसान

इस साल के शुरुआती आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और साफ करते हैं. मार्च से अप्रैल के शुरुआती दिनों तक सिर्फ 38 दिनों में ही देश के कई हिस्सों में 29 दिनों तक बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि दर्ज की गई.

इस दौरान करीब 6.27 लाख हेक्टेयर से ज्यादा फसल प्रभावित हुई है. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे बड़े कृषि राज्यों में इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिला. आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 3.47 लाख हेक्टेयर, महाराष्ट्र में 2.04 लाख हेक्टेयर और बिहार में करीब 45 हजार हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई. विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़े वास्तविक नुकसान से भी कम हो सकते हैं, क्योंकि कई राज्यों के पूरे आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं.

मार्च-अप्रैल बना सबसे जोखिम भरा समय

मार्च और अप्रैल का समय किसानों के लिए सबसे अहम होता है, क्योंकि इसी दौरान रबी फसलों की कटाई होती है. गेहूं, सरसों, चना और दालें इस समय पककर तैयार होती हैं.

लेकिन अब यही समय सबसे ज्यादा खतरनाक बनता जा रहा है. जब फसल कटाई के करीब होती है, उसी समय अचानक बारिश या ओलावृष्टि होने से पूरी फसल खराब हो जाती है. इस स्थिति में किसान के पास दोबारा फसल लगाने का कोई विकल्प नहीं बचता और उसकी पूरी आय खत्म हो जाती है.

इतना ही नहीं, हल्की बारिश भी इस समय फसल की गुणवत्ता को प्रभावित कर देती है. दानों की चमक कम हो जाती है और बाजार में कम कीमत मिलती है, जिससे किसानों का नुकसान और बढ़ जाता है.

फसलों पर बढ़ता दबाव

इस बदलते मौसम का सबसे ज्यादा असर गेहूं जैसी प्रमुख फसलों पर पड़ा है. पहले ही फरवरी में बढ़ती गर्मी के कारण गेहूं की फसल दबाव में रहती है, और अब मार्च-अप्रैल की बारिश इसे और नुकसान पहुंचा रही है. इसके अलावा आलू, प्याज और लहसुन जैसी फसलें भी प्रभावित हो रही हैं, खासकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ रहा है और कृषि अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो रही है.

नुकसान का दायरा बढ़ा

पहले प्री-मानसून नुकसान मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहता था. लेकिन अब इसका दायरा तेजी से बढ़ रहा है.

2026 में महाराष्ट्र एक बड़ा हॉटस्पॉट बनकर उभरा है, जहां मार्च महीने में ही 1.2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा फसल प्रभावित हुई. इसके अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी नुकसान की खबरें सामने आई हैं. यह बदलाव इस बात का बताता है कि अब यह समस्या पूरे देश में फैल रही है, जो भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

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मौसम बदलाव की वजह

मौसम विभाग के अनुसार, इस तरह की बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के पीछे पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) की सक्रियता एक बड़ी वजह है. जब ठंडी हवाएं और गर्मी आपस में टकराती हैं, तो तेज तूफान और ओलावृष्टि जैसी स्थितियां बनती हैं. इसके साथ ही अरब सागर से आने वाली नमी और अस्थिर मौसम प्रणाली इस स्थिति को और गंभीर बना देती है.

किसानों के सामने नई चुनौती

अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि किसानों को साल में दो बड़े जोखिम झेलने पड़ सकते हैं एक प्री-मानसून और दूसरा मानसून. इसका मतलब है कि खेती अब पहले से ज्यादा अनिश्चित हो गई है. पुराने मौसम पैटर्न के आधार पर खेती की योजना बनाना अब मुश्किल होता जा रहा है.

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