खेती बनी बोझ: यवतमाल में एक महीने में 21 किसानों ने की आत्महत्या… सवालों के घेरे में सिस्टम
खेती अब सिर्फ मेहनत का काम नहीं रह गई है, बल्कि किस्मत का खेल बन गई है. कभी समय पर बारिश नहीं होती, तो कभी बेमौसम बारिश मेहनत पर पानी फेर देती है. जलवायु बदलाव का असर सबसे पहले किसानों पर ही पड़ता है. ऊपर से बाजार में दाम गिरने का डर हमेशा बना रहता है.
Yavatmal farmer suicides: महाराष्ट्र का यवतमाल जिला एक बार फिर किसानों के दर्द की वजह से सुर्खियों में है. जनवरी महीने में यहां 21 किसानों ने आत्महत्या कर ली. ये आंकड़ा सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि 21 परिवारों की उजड़ी हुई दुनिया है, 21 घरों का सन्नाटा है और 21 बार टूटा हुआ वह सपना है, जिसमें खेती को जीवन का सहारा माना गया था. विदर्भ का यह इलाका सालों से किसान संकट की मार झेल रहा है, लेकिन हालात सुधरने के बजाय हर साल और गहरे होते जा रहे हैं.
खेती, जो कभी सहारा थी, अब बोझ बनती जा रही है
द प्रिंट की खबर के अनुसार, यवतमाल में कपास और सोयाबीन की खेती बड़े पैमाने पर होती है. कभी यही फसलें किसानों की पहचान थीं, लेकिन आज यही उनकी सबसे बड़ी चिंता बन चुकी हैं. बीज, खाद, कीटनाशक और डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. खेती की लागत हर सीजन में नई ऊंचाई छू रही है, जबकि फसल का दाम कब मिलेगा और कितना मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है. कई किसानों के लिए हालात ऐसे हो गए हैं कि पूरी फसल बेचने के बाद भी कर्ज नहीं उतरता.
मौसम और बाजार, दोनों बने दुश्मन
खेती अब सिर्फ मेहनत का काम नहीं रह गई है, बल्कि किस्मत का खेल बन गई है. कभी समय पर बारिश नहीं होती, तो कभी बेमौसम बारिश मेहनत पर पानी फेर देती है. जलवायु बदलाव का असर सबसे पहले किसानों पर ही पड़ता है. ऊपर से बाजार में दाम गिरने का डर हमेशा बना रहता है. न्यूनतम समर्थन मूल्य होने के बावजूद सरकारी खरीद सीमित है, जिससे किसानों को खुले बाजार में औने-पौने दाम पर फसल बेचनी पड़ती है.
पुराना है संकट, लेकिन समाधान अब भी अधूरा
किसान नेता किशोर तिवारी का कहना है कि विदर्भ में किसान आत्महत्याओं की समस्या कोई नई नहीं है. यह संकट 1998 से चला आ रहा है. इस दौरान कई सरकारें आईं और गईं, कई योजनाएं बनीं, कई राहत पैकेज घोषित हुए, लेकिन जमीनी हालात बहुत कम बदले. सिंचाई की कमी, मिट्टी की बिगड़ती सेहत, स्थानीय स्तर पर भंडारण और प्रोसेसिंग की सुविधाओं का अभाव ये समस्याएं आज भी जस की तस हैं.
कर्जमाफी नहीं, भरोसे की जरूरत
तिवारी मानते हैं कि बार-बार कर्ज माफ करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. इससे कुछ समय की राहत तो मिलती है, लेकिन किसान फिर उसी चक्र में फंस जाता है. जरूरत है ऐसी दीर्घकालिक नीति की, जिसमें किसान को सस्ता और सुरक्षित कर्ज मिले, फसल का उचित दाम तय हो और जोखिम कम हो. नकदी फसलों के बजाय मोटे अनाज और दलहन जैसी कम जोखिम वाली खेती को बढ़ावा देने से भी हालात सुधर सकते हैं.
प्रशासन का दावा, राहत की कोशिशें जारी
यवतमाल के कलेक्टर विकास मीणा ने जनवरी में 21 किसान आत्महत्याओं की पुष्टि की है. उनका कहना है कि राज्य सरकार की ‘मिशन उभारी अभियान’ योजना के तहत संकट में फंसे किसानों और उनके परिवारों को मदद दी जा रही है. आर्थिक सहायता के साथ-साथ जरूरी सरकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. प्रशासन का दावा है कि मानसिक और सामाजिक सहयोग पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि परिवार इस सदमे से उबर सकें.
सवाल जो हर बार रह जाते हैं
हर किसान आत्महत्या के बाद प्रशासन सक्रिय होता है, योजनाएं सामने आती हैं और मदद के वादे किए जाते हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये कदम समय रहते उठाए जा रहे हैं? क्या किसान तब तक सुने जाते हैं, जब तक वे जिंदा होते हैं? यवतमाल की ये 21 मौतें सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं हैं, बल्कि देश की खेती व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल हैं.