पंजाब में DSR तकनीक को बढ़ावा, किसानों को धान की इन दो किस्मों की खेती करने की सलाह.. होगी बंपर पैदावार

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय ने धान की बुवाई से पहले किसानों को डीएसआर तकनीक, संतुलित उर्वरक उपयोग और मिट्टी परीक्षण के प्रति जागरूक किया. विशेषज्ञों ने बताया कि डीएसआर से पानी की बचत, लागत में कमी और बेहतर उत्पादन संभव है. किसानों को बासमती किस्मों, खरपतवार प्रबंधन और सरकारी योजनाओं की भी जानकारी दी गई.

नोएडा | Updated On: 3 Jun, 2026 | 06:56 PM

Paddy Cultivation: धान की बुवाई का मौसम शुरू होने के साथ ही पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने किसानों को पानी बचाने वाली तकनीकों के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान शुरू किया है. इसका उद्देश्य भूजल संरक्षण के साथ-साथ खेती की लागत कम करना है. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के फार्म एडवाइजरी सर्विस सेंटर (FASC), संगरूर ने गांव छन्नो में किसानों के लिए जागरूकता शिविर आयोजित किया. इस दौरान किसानों को डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक और संतुलित उर्वरक उपयोग के बारे में जानकारी दी गई. साथ ही किसानों को पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 1847 की खेती के लिए बीजों के उपचार के बारे में बताया गया.

पीएयू-एफएएससी संगरूर के प्रभारी और वरिष्ठ विस्तार वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने ‘द ट्रिब्यून’ से कहा कि डीएसआर तकनीक भूजल बचाने, मजदूरी की जरूरत कम करने और धान की खेती की लागत घटाने में काफी प्रभावी है. उन्होंने किसानों से पानी और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को अपनाने की अपील की. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा सुझाई गई डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक अपनाने से सिंचाई के पानी की काफी बचत की जा सकती है. उन्होंने कहा कि यदि किसान अनुशंसित तरीकों का पालन करें, तो डीएसआर से भी रोपाई वाले धान के बराबर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

डीएसआर तकनीक से धान की खेती

विशेषज्ञों ने किसानों को डीएसआर की सफल खेती के लिए लेजर लैंड लेवलिंग अपनाने, विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित धान की किस्मों का चयन करने और खरपतवार नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी. उनका कहना है कि इन उपायों से पानी की बचत के साथ खेती की लागत भी कम होगी और बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकेगा. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने किसानों को मिट्टी की जांच के लिए वैज्ञानिक तरीके से नमूने लेने की प्रक्रिया समझाई और इसका व्यावहारिक प्रदर्शन भी किया.

डीएपी का अंधाधुंध इस्तेमाल

उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे धान और बासमती की खेती में डीएपी का अंधाधुंध इस्तेमाल न करें और यूरिया का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने से बचें. खासतौर पर खेत की तैयारी के दौरान कई बोरी यूरिया डालने की प्रथा को हतोत्साहित किया गया. विशेषज्ञों ने कहा कि जिंक का उपयोग भी मिट्टी की जरूरत और सिफारिश के अनुसार ही करना चाहिए. इसके अलावा उन्होंने धान की नर्सरी में एजोस्पिरिलम जैव उर्वरक के इस्तेमाल के फायदे बताए. उनका कहना है कि इससे फसल की उत्पादकता बढ़ती है और मिट्टी की जैविक गुणवत्ता एवं स्वास्थ्य में भी सुधार होता है.

पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंधन

कार्यक्रम के दौरान किसानों को स्वस्थ धान की नर्सरी तैयार करने, पोषक तत्वों के संतुलित प्रबंधन  और धान की नर्सरी में बौनेपन (ड्वार्फिंग) रोग की पहचान व नियंत्रण के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई. विशेषज्ञों ने बताया कि समय पर रोग की पहचान और सही प्रबंधन से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है. वहीं, कृषि विकास अधिकारी (ADO) आकाशदीप सिंह ने किसानों को कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मक्का की खेती, डीएसआर तकनीक अपनाने और जिप्सम के उपयोग पर किसानों को सब्सिडी दी जा रही है. साथ ही डीएसआर में खरपतवार नियंत्रण के प्रभावी तरीकों के बारे में भी जानकारी साझा की.

 

Published: 3 Jun, 2026 | 11:30 PM

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