अपनी रंगत के लिए मशहूर है यह मिर्च.. लिपस्टिक और नेल पेंट बनाने में होता है इस्तेमाल, कब करें खेती

1980 के दशक में भीवापुर, कुही और उमरेड क्षेत्रों में यह मिर्च करीब 1,500 हेक्टेयर में उगाई जाती थी, लेकिन 2025 तक इसका रकबा घटकर भीवापुर में लगभग 125 एकड़ और कुही में सिर्फ 30 एकड़ रह गया है. यह गिरावट लगातार जारी है. विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक भीवापुर मिर्च की जगह अब हाइब्रिड किस्मों ने ले ली है.

नोएडा | Updated On: 5 Apr, 2026 | 02:05 PM

Chilli Farming: जब भी मिर्च की बात होती है, तो लोगों के दिमाग में सबसे पहले असम की भूत जोलोकिया, आंध्र प्रदेश की गुंटूर मिर्च और कर्नाटक की ब्यादगी मिर्च की तस्वीर सामने आती है. ये मिर्च अपने गहरे रंग और तीखेपन के लिए मशहूर हैं. इन नामों में राजस्थान की मथानिया मिर्च भी शामिल है. लेकिन क्या आपने माहाराष्ट्र में उगाए जाने वाली भीवापुर मिर्च के बारे में सुना है. अगर नहीं सुना है तो आज जान लीजिए. यह मिर्च अपनी रंगत के लिए इतनी मशहूर है. इसका इस्तेमाल लाल लिपस्टिक, नेल पेंट और रंगीन क्रीम बनाने में भी किया जाता है. इतनी खासियत होने के बावजूद इसकी खेती सीमित है. यही वजह है कि इसे जीआई टैग भी मिला हुआ है.

भिवापुर मिर्च महाराष्ट्र के नागपुर जिले के भिवापुर इलाके में उगाई जाने वाली एक खास और तीखी मिर्च  है. इसे अपने अलग स्वाद, गहरे लाल रंग और खुशबू के कारण GI टैग मिला है. यह मिर्च करीब 1.5 इंच लंबी और मोटी त्वचा वाली होती है. इसका इस्तेमाल खासतौर पर वरहाड़ी ठेचा बनाने और खाने में चमकदार लाल रंग लाने के लिए किया जाता है. इसमें लगभग 20,000 स्कोविल हीट यूनिट (SHU) का तीखापन होता है, जो इसे मध्यम से काफी ज्यादा मसालेदार बनाता है. इसकी मोटी त्वचा होने के कारण यह 1.5 से 2 साल तक सुरक्षित रहती है और जल्दी खराब नहीं होती.

अचार और ठेचा में होता है इसका खूब इस्तेमाल

इसका उपयोग खासतौर पर महाराष्ट्रीयन व्यंजनों जैसे करी, अचार और ठेचा में स्वाद और रंग बढ़ाने के लिए किया जाता है. यह मिर्च पारंपरिक तरीकों से उगाई जाती है, जिसमें इसे हाथ से तोड़ा और सुखाया जाता है. यह मुख्य रूप से नागपुर क्षेत्र में मिलती है और हरी (कच्ची) व सूखी (लाल) दोनों रूपों में उपलब्ध होती है.

इसकी खेती में लगातार कमी दर्ज की जा रही है

भीवापुर मिर्च की उत्पत्ति महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के नागपुर जिले में स्थित भिवापुर कस्बे से जुड़ी है. इस इलाके में पीढ़ियों से इसकी खेती की जा रही है. इसमें कैप्साइसिन की मात्रा अन्य कई भारतीय मिर्चों के मुकाबले ज्यादा होती है, जो इसके तीखेपन  को और बढ़ाती है. ऐसे भीवापुर मिर्च को 2016-17 में जीआई टैग से पहचान मिली. लेकिन अब धीरे-धीरे इसका रकबा कम होता जा रहा है. अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के बावजूद इसकी खेती में लगातार कमी दर्ज की जा रही है.

उमरेड क्षेत्रों में करीब 1,500 हेक्टेयर में होती है खेती

1980 के दशक में भीवापुर, कुही और उमरेड क्षेत्रों में यह मिर्च करीब 1,500 हेक्टेयर में उगाई जाती थी, लेकिन 2025 तक इसका रकबा घटकर भीवापुर में लगभग 125 एकड़ और कुही में सिर्फ 30 एकड़ रह गया है. यह गिरावट लगातार जारी है. विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक भीवापुर मिर्च की जगह अब हाइब्रिड किस्मों ने ले ली है. ये किस्में ज्यादा उत्पादन, कम जोखिम और बेहतर आर्थिक लाभ देती हैं. हालांकि, इनमें भीवापुर मिर्च जैसा खास स्वाद और गुणवत्ता नहीं होती, फिर भी किसान अधिक मुनाफे के कारण इन्हें अपनाने लगे हैं.

भीवापुर मिर्च की खेती एक पारंपरिक तरीके से होती है

भीवापुर मिर्च हर जगह नहीं उगाई जा सकती, क्योंकि इसकी खेती खास तरह के वातावरण पर निर्भर करती है. विदर्भ क्षेत्र की मिट्टी पानी को अच्छी तरह सोखती है और इसमें लोहा, मैंगनीज और तांबा जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो मिर्च के रंग और स्वाद को बेहतर बनाते हैं. यहां हर साल लगभग 1250 से 1350 मिमी तक अच्छी मॉनसूनी बारिश होती है और जलवायु गर्मी व नमी के बीच संतुलित रहती है, जहां औसत तापमान करीब 30 डिग्री सेल्सियस रहता है. भीवापुर मिर्च की खेती एक पारंपरिक तरीके से होती है. जुलाई में बीज नर्सरी में बोए जाते हैं और अगस्त में रोपाई की जाती है, जिसमें अक्सर जैविक खाद का इस्तेमाल होता है. करीब 45 दिनों में फूल आने लगते हैं और 60 दिनों के अंदर हरी मिर्च तैयार हो जाती है. किसान धैर्य के साथ मिर्च के पूरी तरह गहरे लाल रंग में पकने का इंतजार करते हैं, ताकि उसकी गुणवत्ता बनी रहे.

रोग में भी काम आती है भीवापुर मिर्च

भीवापुर मिर्च पोषक तत्वों से भरपूर होती है. इसमें विटामिन A, B, B6 और C के साथ-साथ पोटेशियम, मैग्नीशियम  और मोलिब्डेनम अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. इसे सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. यह गठिया और सिरदर्द में राहत देने, धूम्रपान से फेफड़ों में होने वाली सूजन को कम करने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मददगार मानी जाती है.

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Published: 5 Apr, 2026 | 02:04 PM

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