असम का खुशबूदार जोहा चावल अब यूरोप की थाली में, पहली बार ब्रिटेन और इटली भेजी गई बड़ी खेप

जोहा चावल असम की एक पारंपरिक और बेहद सुगंधित किस्म है. इसकी खुशबू और स्वाद इसे सामान्य चावल से अलग बनाते हैं. यही कारण है कि इसे घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रीमियम उत्पाद माना जाता है. इस चावल को वर्ष 2017 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला था.

नई दिल्ली | Published: 14 Mar, 2026 | 07:41 AM

Assam Joha rice export: भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य असम के किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है. असम का प्रसिद्ध और खुशबूदार जोहा चावल अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रहा है. हाल ही में पहली बार इस जीआई-टैग वाले चावल की बड़ी खेप यूरोप के देशों ब्रिटेन और इटली को निर्यात की गई है.

PIB के अनुसार, इस निर्यात को वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली संस्था एपीडा (APEDA) ने संभव बनाया है. यह कदम न केवल भारत के कृषि निर्यात को बढ़ावा देगा, बल्कि असम के किसानों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएगा.

25 मीट्रिक टन जोहा चावल की पहली बड़ी खेप

सरकारी जानकारी के अनुसार 12 मार्च 2026 को असम से 25 मीट्रिक टन जीआई-टैग वाला जोहा चावल ब्रिटेन और इटली के लिए भेजा गया. यह पहली बार है जब असम का यह खास चावल यूरोप के इन बाजारों तक बड़े पैमाने पर पहुंचा है.

इस पूरी प्रक्रिया में असम सरकार के कृषि विभाग और एपीडा ने मिलकर काम किया है. चावल की यह खेप कोलकाता की एपीडा पंजीकृत कंपनी सेफ एग्रीट्रेड प्राइवेट लिमिटेड के जरिए निर्यात की गई है. वहीं इसे असम के गुवाहाटी स्थित प्रतिक एग्रो फूड प्रोसेसिंग यूनिट में प्रोसेस और पैक किया गया.

जोहा चावल की खासियत

जोहा चावल असम की एक पारंपरिक और बेहद सुगंधित किस्म है. इसकी खुशबू और स्वाद इसे सामान्य चावल से अलग बनाते हैं. यही कारण है कि इसे घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रीमियम उत्पाद माना जाता है. इस चावल को वर्ष 2017 में भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला था. जीआई टैग मिलने के बाद इसकी पहचान और बढ़ी है और अब यह दुनिया के कई देशों में लोकप्रिय हो रहा है.

असम के कई जिलों में होती है खेती

असम में जोहा चावल की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. राज्य में लगभग 21,662 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती होती है. वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 43,298 मीट्रिक टन जोहा चावल का उत्पादन हुआ था.

इसकी खेती मुख्य रूप से नगांव, बकसा, गोलपाड़ा, शिवसागर, माजुली, चिरांग और गोलाघाट जैसे जिलों में होती है. इन जिलों के किसानों के लिए यह चावल एक महत्वपूर्ण नकदी फसल बनता जा रहा है.

पहले भी कई देशों को भेजा जा चुका है चावल

एपीडा पिछले कुछ समय से जोहा चावल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है. इससे पहले भी इसकी छोटी खेप विदेशों में भेजी जा चुकी है. एपीडा ने पहले 1 मीट्रिक टन जोहा चावल वियतनाम भेजा था. इसके अलावा कुवैत, बहरीन, कतर, ओमान और सऊदी अरब जैसे मध्य पूर्व के देशों में भी लगभग 2 मीट्रिक टन जोहा चावल का निर्यात किया गया था. अब यूरोप के बाजारों में इसकी एंट्री को एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जोहा चावल की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ती है तो इसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा. विदेशी बाजारों में प्रीमियम कीमत मिलने से किसानों की आय में भी बढ़ोतरी हो सकती है. सरकार का भी यही प्रयास है कि भारत के अलग-अलग राज्यों के पारंपरिक और जीआई-टैग वाले कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुंचाया जाए.

उत्तर-पूर्व से कृषि निर्यात को मिलेगा बढ़ावा

यह पहल उत्तर-पूर्वी भारत के कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. एपीडा का कहना है कि भविष्य में जोहा चावल समेत उत्तर-पूर्व के अन्य कृषि उत्पादों को भी वैश्विक बाजारों तक पहुंचाने के लिए ऐसे प्रयास जारी रहेंगे. इससे न केवल निर्यात बढ़ेगा बल्कि स्थानीय किसानों और कृषि आधारित उद्योगों को भी नया अवसर मिलेगा.

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