coconut oil price fall: भारत के दक्षिणी राज्यों में इन दिनों नारियल तेल और खोपरा (सूखा नारियल) के दामों में तेज गिरावट देखने को मिल रही है. कुछ महीने पहले तक जिन किसानों और व्यापारियों के चेहरे पर मुनाफे की मुस्कान थी, अब वही लोग नुकसान और अनिश्चितता की चिंता में घिरे हुए हैं. बढ़ती पैदावार, कमजोर मांग और निर्यात में आ रही दिक्कतों ने मिलकर इस पूरे बाजार को हिला दिया है. यह बदलाव इतना तेज रहा कि एक साल के अंदर ही बाजार का पूरा माहौल बदल गया. आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ और इसका असर किसानों व बाजार पर क्या पड़ रहा है.
एक साल में ही बदल गई तस्वीर
कोचीन ऑयल मर्चेंट्स एसोसिएशन (COMA) के अनुसार, पिछले साल जुलाई के आसपास नारियल तेल और खोपरा के दाम अपने सबसे ऊंचे स्तर पर थे. उस समय नारियल तेल करीब 393 रुपये प्रति लीटर और खोपरा 259 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा था. इन ऊंचे दामों ने किसानों को बेहतर मुनाफे की उम्मीद दी थी. लेकिन अप्रैल 2026 आते-आते स्थिति पूरी तरह बदल गई. अब नारियल तेल की कीमत घटकर लगभग 266 रुपये प्रति लीटर और खोपरा 153 रुपये प्रति किलो रह गई है. यानी करीब 30 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है. इस तेजी से आई गिरावट ने किसानों और व्यापारियों दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
ज्यादा उत्पादन बना सबसे बड़ी वजह
इस साल के सीजन में केरल और तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्यों में नारियल की बंपर पैदावार हुई. अच्छी फसल होने से बाजार में नारियल की सप्लाई अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गई. जब बाजार में सामान ज्यादा हो और खरीदने वाले कम हों, तो कीमतों का गिरना तय होता है. यही स्थिति अभी नारियल बाजार में देखने को मिल रही है. मंडी में ताजा नारियल की भरमार होने से दाम लगातार नीचे जा रहे हैं और इसका सीधा असर खोपरा और तेल की कीमतों पर भी पड़ा है.
कच्चे नारियल के दाम भी गिरे, किसानों को नुकसान
सिर्फ प्रोसेस्ड उत्पाद ही नहीं, बल्कि कच्चे नारियल के दाम भी तेजी से गिरे हैं. पिछले 7 महीनों में कच्चे नारियल की कीमत लगभग 36 रुपये प्रति किलो तक गिर चुकी है. जहां पहले यह 70-75 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वहीं अब कुछ मंडियों में यह करीब 45 प्रति रुपये किलो तक आ गया है. समस्या यह है कि किसानों की लागत लगभग 50 रुपये प्रति किलो के आसपास आती है. यानी किसान लागत से कम कीमत पर बेचने को मजबूर हैं, जिससे उन्हें सीधा नुकसान हो रहा है.
बदली उपभोक्ताओं की पसंद
पिछले साल जब नारियल तेल के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए थे, तब लोगों ने दूसरे सस्ते खाने वाले तेलों का इस्तेमाल शुरू कर दिया. एक बार आदत बदलने के बाद लोग वापस नारियल तेल की ओर पूरी तरह नहीं लौटे, भले ही अब इसके दाम कम हो गए हों. केरल जैसे राज्यों में अभी भी नारियल तेल का उपयोग ज्यादा होता है, लेकिन बाकी राज्यों में इसका इस्तेमाल सीमित हो गया है. इससे मांग कमजोर बनी हुई है.
व्यापारी भी कर रहे हैं सावधानी
बाजार में गिरते दामों को देखकर व्यापारी और बड़ी कंपनियां भी फिलहाल ज्यादा स्टॉक खरीदने से बच रही हैं. उन्हें डर है कि आगे कीमतें और गिर सकती हैं. इसी वजह से तमिलनाडु जैसे राज्यों में व्यापारी अपना पुराना स्टॉक तेजी से निकाल रहे हैं और नई खरीद कम कर रहे हैं. इससे बाजार में मांग और कमजोर हो गई है.
निर्यात में दिक्कतों ने बढ़ाई परेशानी
कोचीन ऑयल मर्चेंट्स एसोसिएशन (COMA) के अनुसार, नारियल उत्पादों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों (गल्प देशों) में निर्यात किया जाता है. लेकिन पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण व्यापार प्रभावित हुआ है. शिपिंग खर्च बढ़ गया है और लॉजिस्टिक समस्याएं भी सामने आ रही हैं. इसके चलते कई निर्यात कंपनियों ने नई खरीद रोक दी है. इसका असर यह हुआ कि जो माल विदेश जाना था, वह अब देश के अंदर ही जमा हो रहा है, जिससे सप्लाई और बढ़ गई है.
मजदूरों की कमी भी बनी वजह
हाल ही में कुछ राज्यों में चुनाव के कारण कई मजदूर अपने घर लौट गए. इससे खोपरा प्रोसेसिंग का काम प्रभावित हुआ. जब प्रोसेसिंग कम होगी, तो कच्चे नारियल की मांग भी कम होगी. इससे बाजार में असंतुलन और बढ़ गया है.
किसानों के सामने बड़ा संकट
इस पूरी स्थिति का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ रहा है. लागत बढ़ रही है, लेकिन दाम घट रहे हैं. कई किसान अब सोचने पर मजबूर हैं कि क्या नारियल की खेती उनके लिए फायदे का सौदा है या नहीं. अगर यही स्थिति बनी रही, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है.
सरकार से मदद की उम्मीद
अब किसान और उद्योग से जुड़े लोग सरकार से मदद की मांग कर रहे हैं. जैसे:
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) लागू करना
- सरकारी खरीद बढ़ाना
- निर्यात को बढ़ावा देना
- नए बाजार खोलना
इसके अलावा, नारियल से जुड़े नए उत्पाद (जैसे नारियल पानी, नारियल पाउडर, ब्यूटी प्रोडक्ट्स) बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि किसानों को बेहतर कीमत मिल सके.
क्या मानसून बदल सकता है हालात?
आने वाले समय में बाजार की दिशा काफी हद तक मानसून पर निर्भर करेगी. अगर बारिश अच्छी होती है और उत्पादन नियंत्रित रहता है, तो कीमतों में सुधार आ सकता है. लेकिन फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और सभी की नजर आने वाले महीनों पर टिकी है.