खेती बनेगी निर्यात की ताकत, चार साल में भारत हासिल कर सकता है 100 अरब डॉलर का आंकड़ा

भारत आज मूल्य के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश है. इसके बावजूद वैश्विक कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी उतनी नहीं बढ़ पाई, जितनी बढ़नी चाहिए थी. विश्व व्यापार संगठन (WTO) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2000 में वैश्विक कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.1 प्रतिशत थी, जो 2024 तक बढ़कर 2.2 प्रतिशत जरूर हुई, लेकिन यह बढ़ोतरी बहुत सीमित मानी जा रही है.

नई दिल्ली | Published: 30 Jan, 2026 | 07:48 AM

India agri exports: भारत की खेती सिर्फ देश का पेट भरने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अब यह दुनिया के बाजारों में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है. आर्थिक समीक्षा के मुताबिक, अगर नीतियां स्थिर रहें और सही दिशा में काम हो, तो भारत अगले चार वर्षों में कृषि, समुद्री उत्पाद, खाद्य और पेय पदार्थों के निर्यात से 100 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. फिलहाल वित्त वर्ष 2024-25 में देश का कृषि निर्यात करीब 51.1 अरब डॉलर रहा है. यानी आने वाले सालों में इसे लगभग दोगुना करने की पूरी गुंजाइश मौजूद है.

उत्पादन में नंबर दो, निर्यात में अभी भी पीछे

भारत आज मूल्य के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक देश है. इसके बावजूद वैश्विक कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी उतनी नहीं बढ़ पाई, जितनी बढ़नी चाहिए थी. विश्व व्यापार संगठन (WTO) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2000 में वैश्विक कृषि निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.1 प्रतिशत थी, जो 2024 तक बढ़कर 2.2 प्रतिशत जरूर हुई, लेकिन यह बढ़ोतरी बहुत सीमित मानी जा रही है.

इसका साफ मतलब है कि देश में उत्पादन की ताकत तो है, लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पूरी तरह पहुंचाने में अभी काफी संभावनाएं छिपी हुई हैं. आर्थिक समीक्षा मानती है कि अगर घरेलू जरूरतों और निर्यात के बीच सही संतुलन बनाया जाए, तो भारत अपनी कृषि ताकत को निर्यात आधारित विकास में बदल सकता है.

किसानों के लिए निर्यात क्यों है जरूरी

कृषि निर्यात सिर्फ विदेशी मुद्रा कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि इससे किसानों को भी सीधा फायदा मिलता है. जब किसान वैश्विक बाजारों से जुड़ते हैं, तो उन्हें फसलों की गुणवत्ता, पैकेजिंग, भंडारण और प्रोसेसिंग के बारे में नई जानकारी मिलती है. इससे उनकी उत्पादकता बढ़ती है और वे ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनते हैं.

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि निर्यात से मिलने वाला बाजार फीडबैक किसानों को बेहतर उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ाता है. इससे खेती केवल गुजारे का साधन न रहकर एक मजबूत एग्री बिजनेस का रूप ले सकती है.

नीतियों की अस्थिरता बनी सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि, इस रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं. सर्वे के अनुसार, कृषि निर्यात पर घरेलू कीमतों में उतार-चढ़ाव, खाद्य सुरक्षा की चिंता, प्रोसेसिंग सुविधाओं की कमी, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और जटिल नियमों का सीधा असर पड़ता है.

अक्सर सरकार घरेलू महंगाई को काबू में रखने के लिए अचानक निर्यात पर प्रतिबंध, न्यूनतम निर्यात मूल्य (MEP) या अन्य अस्थायी फैसले ले लेती है. आर्थिक समीक्षा साफ शब्दों में चेतावनी देती है कि इस तरह के बार-बार बदलने वाले फैसले निर्यात सप्लाई चेन को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे विदेशी खरीदारों का भरोसा टूटता है और वे दूसरे देशों की ओर रुख कर लेते हैं. एक बार जो बाजार हाथ से निकल जाता है, उसे वापस पाना आसान नहीं होता.

बढ़ती अर्थव्यवस्था और निर्यात की जरूरत

भारत एक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. जैसे-जैसे देश की जरूरतें बढ़ेंगी, वैसे-वैसे आयात भी बढ़ेगा. यह दुनिया भर का अनुभव रहा है. ऐसे में जरूरी है कि भारत अपने आयात का खर्च उठाने के लिए निर्यात से होने वाली कमाई को मजबूत करे.

आर्थिक समीक्षा मानती है कि कृषि निर्यात भारत के लिए “लो-हैंगिंग फ्रूट” यानी ऐसा क्षेत्र है, जिसमें कम मेहनत में भी बड़ा फायदा मिल सकता है. इसके साथ ही कृषि निर्यात से भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक मजबूती भी मिलती है. इसलिए नीतियों को इस सोच के साथ तैयार करना जरूरी है.

आंकड़े बताते हैं बढ़त की कहानी

अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी हद तक सकारात्मक दिखती है. वित्त वर्ष 2020 से 2025 के बीच भारत के कुल मर्चेंडाइज निर्यात में औसतन 6.9 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई. वहीं, इसी दौरान कृषि निर्यात 34.5 अरब डॉलर से बढ़कर 51.1 अरब डॉलर पहुंच गया. यह करीब 8.2 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर को दर्शाता है, जो कुल निर्यात की तुलना में बेहतर है.

हालांकि, वित्त वर्ष 2023 से 2025 के बीच कृषि निर्यात में ठहराव देखने को मिला. यह तब हुआ, जब वैश्विक स्तर पर कृषि उत्पादों का निर्यात 2022 में 2.3 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2024 में 2.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया. यानी दुनिया का बाजार बढ़ रहा था, लेकिन भारत उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाया.

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