CAQM ने राज्यों को भेजा नया निर्देश, अब सर्दियों के साथ गर्मियों की पराली पर भी कड़ी निगरानी

इस साल पंजाब और हरियाणा में अक्टूबर–नवंबर के दौरान धान की पराली जलाने के मामलों में ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई है. लेकिन IARI के आंकड़े दिखाते हैं कि गर्मी के महीनों में आग की घटनाएं अधिक रिपोर्ट हुईं, जिससे स्पष्ट है कि पराली प्रबंधन में अब तक का फोकस अधूरा था.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 5 Dec, 2025 | 11:46 AM

उत्तर भारत में प्रदूषण लंबे समय से सिर्फ सर्दियों की समस्या मानी जाती थी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. हवा में जहरीले कणों की मात्रा पूरे साल ही खतरनाक स्तर पर बनी रहती है. हर साल अक्टूबर–नवंबर में धान की पराली जलने से दिल्ली–एनसीआर की हवा बुरी तरह बिगड़ जाती है, लेकिन गर्मियों के दौरान होने वाली गेहूं की पराली का धुआं भी हवा को उतना ही नुकसान पहुंचाता है. इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र की प्रदूषण नियंत्रण संस्था, कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM), ने अब एक बड़ा कदम उठाया है. पहली बार पंजाब और हरियाणा को आदेश दिया गया है कि वे रबी सीजन की पराली जलाने पर भी सख्त निगरानी रखें.

गर्मी की पराली भी बढ़ा रही प्रदूषण का बोझ

अब तक पराली पर ज्यादातर ध्यान धान की फसल के बाद जलने वाले खेतों पर रहता था. यह समय ठंड शुरू होने से पहले का होता है, जब हवा पहले ही भारी और धीमी हो जाती है. लेकिन अब वैज्ञानिक आंकड़े बता रहे हैं कि अप्रैल–मई में गेहूं की कटाई के बाद भी खेतों में बड़े पैमाने पर आग लगाई जाती है, जो गर्मियों की हवा में प्रदूषण का नया खतरा बनकर उभर रही है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) की सैटेलाइट मॉनिटरिंग रिपोर्ट में साफ हुआ कि इस साल 1 अप्रैल से 31 मई के बीच पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली में हजारों आग की घटनाएं दर्ज हुईं. मध्य प्रदेश और यूपी में तो यह संख्या 2022 के बाद से सबसे अधिक रही. इस तरह गर्मी की पराली अब उतनी ही गंभीर समस्या बन गई है, जितनी सर्दियों की पराली पहले से है.

CAQM का सख्त निर्देश

1 दिसंबर को भेजे गए पत्र में CAQM ने पंजाब और हरियाणा सरकारों से कहा है कि वे रबी सीजन के लिए अलग से एक विस्तृत एक्शन प्लान तैयार करें. इसमें फसल अवशेष प्रबंधन, किसानों को वैकल्पिक उपाय उपलब्ध कराना, मशीनरी की पहुंच बढ़ाना और आग की किसी भी घटना को तुरंत रोकना शामिल है.

अब दोनों राज्यों को गेहूं की कटाई के बाद खेतों पर होने वाली गतिविधियों की जमीन पर निगरानी, ड्रोन सर्विलांस, और गांव स्तर पर जवाबदेही तय करने जैसे कदम उठाने होंगे. यह पहली बार है जब गर्मियों के समय पराली पर इतना ध्यान दिया जा रहा है.

धान की पराली में कमी, लेकिन गेहूं में बढ़ती आगें बड़ा संकेत

इस साल पंजाब और हरियाणा में अक्टूबर–नवंबर के दौरान धान की पराली जलाने के मामलों में ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई है. लेकिन IARI के आंकड़े दिखाते हैं कि गर्मी के महीनों में आग की घटनाएं अधिक रिपोर्ट हुईं, जिससे स्पष्ट है कि पराली प्रबंधन में अब तक का फोकस अधूरा था. CAQM ने माना कि पुख्ता व्यवस्थाओं के बावजूद कई घटनाएं ऐसी थीं जो सैटेलाइट में भी दर्ज नहीं हुईं. इससे पता चलता है कि जमीनी स्तर पर अभी भी कमियां हैं.

क्यों जरूरी था यह कदम?

दिल्ली–एनसीआर की हवा अक्सर ‘गंभीर’ श्रेणी तक पहुंच जाती है. अगर सर्दियों की पराली तो कम हो जाए, लेकिन गर्मियों में धुआं बढ़ता रहे, तो हवा की कुल गुणवत्ता सालभर खराब ही बनी रहेगी. इसलिए अब प्रदूषण को सिर्फ एक मौसम की समस्या नहीं, बल्कि वार्षिक चुनौती मानते हुए कदम उठाए जा रहे हैं.

CAQM का यह नया फैसला न केवल हवा को साफ रखने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह किसानों को भी प्रोत्साहित करेगा कि वे पराली जलाने के बजाय उसके सही प्रबंधन की ओर बढ़ें.

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