Budget 2026: भारत ने मैन्युफैक्चरिंग, सेवाओं और टेक्नोलॉजी में तेज प्रगति की है, लेकिन खेती आज भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है. 2023- 24 में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का जीडीपी में योगदान करीब 17.8 फीसदी रहा और इससे देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार मिलता है. 2024-25 में भी यह हिस्सेदारी 17-18 फीसदी के आसपास रहने का अनुमान है. अब कृषि सिर्फ खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि बागवानी, मत्स्य पालन, डेयरी, एग्री-प्रोसेसिंग और एग्री-टेक जैसे क्षेत्रों में भी विस्तार हो रहा है, जिससे किसानों की आय बढ़ाने के नए अवसर बन रहे हैं.
प्रिसीजन फार्मिंग, प्राकृतिक खेती, फसल विविधीकरण और ड्रोन जैसी तकनीकों से उत्पादन और दाम बेहतर मिल रहे हैं, लेकिन इसका लाभ सभी किसानों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है. छोटे और सीमांत किसान, जो देश के करीब 86 फीसदी कृषि परिवार हैं, अब भी पीछे हैं. ऐसे में 2026- 27 के बजट में छोटे-मोटे सहयोग से आगे बढ़कर कृषि में संरचनात्मक बदलाव पर जोर देना जरूरी है, ताकि खेती टिकाऊ, मजबूत और समावेशी बन सके.
किसानों की आय और स्थिरता दोनों में बड़ा सुधार हो सकता है
खेती की सबसे बड़ी चुनौती छोटे-छोटे खेत और कमजोर बाजार जुड़ाव हैं. इसका समाधान उत्पादन क्लस्टर मॉडल में है, जहां किसान एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन) के जरिए एकजुट होकर काम कर सकें. क्लस्टर से फसल का एकत्रीकरण, सस्ते इनपुट, साझा ढांचा और बाजार में मजबूत सौदेबाजी संभव होती है. बजट 2026 में एफपीओ की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनकी कार्यक्षमता मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए. इसके साथ ही एनआरएलएम के तहत बने स्वयं सहायता समूह और ग्राम संगठन भी एफपीओ से जुड़कर जमीनी स्तर पर किसानों की भागीदारी बढ़ा सकते हैं. अगर क्लस्टर को स्थानीय फसलों, जलवायु और सहायक आजीविका से जोड़ा जाए, तो किसानों की आय और स्थिरता दोनों में बड़ा सुधार हो सकता है.
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छोटे किसानों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी
खेती में एक बड़ी लेकिन अब तक कम इस्तेमाल की गई संभावना कृषि उद्यमियों की है. ग्रामीण युवा और महिलाएं नर्सरी संचालन, मिट्टी जांच, कृषि इनपुट की आपूर्ति, बाजार से जोड़ने और डिजिटल सलाह जैसी सेवाएं देकर खेती को आगे बढ़ा सकते हैं. इसके लिए बजट में कृषि उद्यमों को खास समर्थन, ग्रामीण इलाकों में स्टार्टअप इनक्यूबेशन, सस्ती वित्तीय मदद और स्किल सर्टिफिकेशन की जरूरत है. इससे खेती सिर्फ गुजारे का साधन नहीं, बल्कि एक मजबूत आर्थिक अवसर बन सकती है. ऐसे उद्यमी गांवों में रोजगार भी पैदा करेंगे और छोटे किसानों को बेहतर सेवाएं मिलेंगी.
देश की बड़ी खेती बारिश पर निर्भर है
खेती में कोई भी बड़ा बदलाव पानी की पक्की व्यवस्था के बिना संभव नहीं है. सिंचाई और जल संरक्षण योजनाओं के बावजूद आज भी देश की बड़ी खेती बारिश पर निर्भर है और जलवायु बदलाव से प्रभावित होती है. बजट 2026 में जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज, माइक्रो-इरिगेशन और सोलर पंप जैसी योजनाओं में निवेश बढ़ाना चाहिए, खासकर सूखा प्रभावित और आदिवासी इलाकों में. साथ ही, सामुदायिक जल प्रबंधन और पानी से जुड़ी सुविधाओं के लिए सस्ती ऋण व्यवस्था से खेती की उत्पादकता बढ़ेगी, जोखिम कम होगा और किसानों की आय स्थिर होगी.
किसान खुद को बेहतर ढंग से ढाल सकेंगे
जलवायु जोखिम बढ़ने के साथ प्राकृतिक और रीजेनेरेटिव खेती को अपनाना अब जरूरी हो गया है. इन तरीकों से खेती की लागत घटती है, मिट्टी की सेहत सुधरती है, पानी की बचत होती है और किसानों की रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम होती है. सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो टिकाऊ खेती करने वाले किसानों को प्रोत्साहन दें. इसके साथ फसल बीमा, मौसम आधारित सलाह और जलवायु अनुकूल बीजों को मजबूत करने से किसान बदलते मौसम के अनुसार खुद को बेहतर ढंग से ढाल सकेंगे.
कम उत्पादकता वाले 100 जिलों को कवर करती है
पीएम धन-धान्य कृषि योजना, जो कम उत्पादकता वाले 100 जिलों को कवर करती है, खेती में एकीकृत बदलाव का बड़ा मौका है. इसके जरिए फसल विविधीकरण, सिंचाई, भंडारण और संस्थागत ऋण को एक साथ जमीन पर उतारा जा सकता है. बजट में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन योजनाओं का लाभ छोटे किसानों, वर्षा आधारित क्षेत्रों और महिला किसान समूहों तक प्राथमिकता से पहुंचे. खेती की तरक्की के लिए सस्ता और समय पर कर्ज बेहद जरूरी है. कृषि ऋण लक्ष्य को 15- 20 फीसदी तक बढ़ाया जाना चाहिए, खासतौर पर मत्स्य पालन जैसे सहायक कृषि कार्यों पर ज्यादा ध्यान देकर, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग बढ़े और किसानों की आय में सुधार हो.