60,000 के पार पहुंचा कपास: किसानों को MSP से ऊपर मिले दाम, लेकिन टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए बढ़ी चुनौती

जहां एक तरफ किसानों के लिए यह स्थिति फायदेमंद है, वहीं कपड़ा उद्योग के लिए थोड़ी चिंता भी है. कपास महंगा होने से धागे (यार्न) की लागत बढ़ रही है, जिससे मिलों पर दबाव बढ़ रहा है. जानकारों का कहना है कि फिलहाल वही मिलें ज्यादा खरीदारी कर रही हैं जिन्हें भुगतान के लिए ज्यादा समय मिल रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 11 Apr, 2026 | 08:36 AM

cotton prices 2026: इन दिनों कपास का बाजार काफी चर्चा में है. वजह है इसके बढ़ते दाम, जिसने किसानों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है. इस सीजन में पहली बार कपास की कीमत 60,000 रुपये प्रति कैंडी (356 किलो) के पार पहुंच गई है. यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि बाजार में कपास की मांग मजबूत है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके भाव में तेजी बनी हुई है.

वैश्विक बाजार से मिल रहा सहारा

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार,  कपास के दाम बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार का रुख है. अमेरिका के इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज (ICE) पर कपास के फ्यूचर दाम जुलाई डिलीवरी के लिए 73 सेंट प्रति पाउंड से ऊपर पहुंच गए हैं. यह पिछले करीब दो साल का सबसे ऊंचा स्तर है.

जब वैश्विक बाजार में तेजी आती है, तो उसका असर भारत जैसे बड़े उत्पादक देश पर भी पड़ता है. यही वजह है कि यहां के बाजार में भी कपास के दाम लगातार मजबूत हो रहे हैं.

देश में भी लगातार बढ़ रहे दाम

घरेलू स्तर पर भी कपास की कीमतों में लगातार इजाफा देखा जा रहा है. कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने हाल ही में प्रति कैंडी 300 रुपये की बढ़ोतरी की है.

अगर पिछले दो हफ्तों पर नजर डालें, तो करीब 1,400 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी हुई है. वहीं, पिछले कुछ महीनों में यह बढ़ोतरी लगभग 4,500 रुपये तक पहुंच चुकी है. इससे साफ है कि बाजार में तेजी धीरे-धीरे लेकिन मजबूती के साथ बनी हुई है.

उत्पादन और खपत दोनों में बढ़ोतरी

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कपास उत्पादन भी बढ़ने की संभावना है. अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के अनुसार, वैश्विक उत्पादन करीब 9 लाख बेल बढ़कर 121.9 मिलियन बेल तक पहुंच सकता है. इसमें चीन, भारत और पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रहेगी. साथ ही, खपत भी बढ़ने का अनुमान है. वैश्विक खपत करीब 119.1 मिलियन बेल तक पहुंच सकती है. चीन और भारत में बढ़ती मांग इसका मुख्य कारण है, हालांकि बांग्लादेश और वियतनाम में मांग थोड़ी कमजोर रह सकती है.

किसानों के लिए राहत की खबर

सबसे अच्छी बात यह है कि किसानों को कपास का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से ऊपर मिल रहा है. कर्नाटक के रायचूर जैसे इलाकों में कपास (कपास) का भाव 9,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है. इससे किसानों की आमदनी में सुधार हो रहा है और उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य मिल रहा है.

मिलों और उद्योग के लिए चुनौती

जहां एक तरफ किसानों के लिए यह स्थिति फायदेमंद है, वहीं कपड़ा उद्योग के लिए थोड़ी चिंता भी है. कपास महंगा होने से धागे (यार्न) की लागत बढ़ रही है, जिससे मिलों पर दबाव बढ़ रहा है. जानकारों का कहना है कि फिलहाल वही मिलें ज्यादा खरीदारी कर रही हैं जिन्हें भुगतान के लिए ज्यादा समय मिल रहा है. इससे साफ है कि बाजार में संतुलन बनाने की कोशिश चल रही है.

चीन की मांग से बढ़ा बाजार

कपास और यार्न की कीमतों में तेजी का एक और बड़ा कारण चीन की मांग है. चीन द्वारा भारतीय यार्न की खरीद बढ़ने से कीमतों को मजबूती मिली है. 30 काउंट कॉम्ब्ड होजरी (30 CCH) यार्न की कीमतें पिछले कुछ हफ्तों में 55-60 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई हैं. पहले यह करीब 235 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर 295 रुपये तक पहुंच गई है.

वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल कपास बाजार मजबूत बना रहेगा, लेकिन बहुत ज्यादा तेजी के बाद कीमतें कुछ समय के लिए स्थिर भी हो सकती हैं. अगर वैश्विक बाजार में मांग बनी रहती है और उत्पादन अनुमान के अनुसार रहता है, तो कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है. वहीं, बेहतर फसल की उम्मीद बाजार को संतुलित बनाए रख सकती है.

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