बाजार में उछले सरसों के भाव, MSP से ज्यादा दाम मिलने पर निजी व्यापारियों को फसल बेच रहे किसान

आमतौर पर मार्च के महीने से नई फसल आने के बाद सरसों के दाम गिरने लगते हैं, लेकिन इस बार उल्टा देखने को मिला है. इस महीने की शुरुआत से ही कीमतों में करीब 9 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो यह दिखाती है कि बाजार में मांग कितनी मजबूत है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 10 Apr, 2026 | 08:20 AM

Israel Iran war impact: इजराइल-ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत की कृषि और बाजार पर भी साफ दिखाई देने लगा है. खासकर खाद्य तेल की कीमतों में आई तेजी ने किसानों के व्यवहार को बदल दिया है. इस समय देश के किसान सरकारी खरीद केंद्रों की बजाय निजी व्यापारियों को अपनी सरसों (रेपसीड) बेचने को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि बाजार में उन्हें बेहतर दाम मिल रहे हैं.

युद्ध का असर अब बाजार पर

दरअसल, इजराइल-ईरान युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी आई है. माना जा रहा है कि इस संघर्ष के चलते बायोफ्यूल के लिए तेल की मांग बढ़ सकती है, जिससे ग्लोबल कीमतें ऊपर जा रही हैं.

भारत, जो दुनिया का सबसे बड़ा वनस्पति तेल आयातक देश है, उसके घरेलू दाम भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से प्रभावित होते हैं. इसी वजह से देश में सरसों और अन्य तिलहन फसलों की कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है.

किसानों को मिल रहा ज्यादा दाम

द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान के भरतपुर जिले के किसान बताते हैं कि खुले बाजार में उन्हें करीब 7,000 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिल रहा है. ऐसे में वे सरकारी खरीद केंद्रों पर क्यों जाएं, जहां न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सिर्फ 6,200 रुपये प्रति क्विंटल है. यही वजह है कि इस बार बड़ी संख्या में किसान अपनी उपज निजी व्यापारियों को बेच रहे हैं.

निजी व्यापारियों की बढ़ी सक्रियता

जयपुर के व्यापारियों के अनुसार, इस समय सरसों की प्रोसेसिंग (क्रशिंग) के लिए अच्छा माहौल बना हुआ है. सरसों के तेल और खली दोनों की मांग मजबूत है, इसलिए ऑयल मिल्स किसान से तेजी से खरीद कर रही हैं. इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और किसानों को बेहतर कीमत मिल रही है.

आयात पर घट रही निर्भरता

सरसों की ज्यादा बिक्री और प्रोसेसिंग के कारण भारत में खाद्य तेल की घरेलू आपूर्ति बढ़ रही है. इसका फायदा यह है कि देश की महंगे आयातित तेलों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सूरजमुखी तेल के रूप में मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राजील, अर्जेंटीना, यूक्रेन और रूस जैसे देशों से आयात करता है. लेकिन इस बार घरेलू उत्पादन बढ़ने और बाजार में उपलब्धता बेहतर होने से आयात का दबाव थोड़ा कम हो सकता है.

कीमतों में आई असामान्य तेजी

आमतौर पर मार्च के महीने से नई फसल आने के बाद सरसों के दाम गिरने लगते हैं, लेकिन इस बार उल्टा देखने को मिला है. इस महीने की शुरुआत से ही कीमतों में करीब 9 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो यह दिखाती है कि बाजार में मांग कितनी मजबूत है.

चीन से बढ़ी मांग का असर

एक और बड़ा कारण चीन की बढ़ती मांग भी है. भारत से सरसों की खली (rapeseed meal) का निर्यात तेजी से बढ़ा है. अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच चीन ने भारत से 7,71,435 मीट्रिक टन सरसों खली खरीदी, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा सिर्फ 24,044 टन था. यह बढ़ोतरी इसलिए भी हुई क्योंकि चीन ने कनाडा से आने वाले सरसों उत्पादों पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया था, जिससे उसने भारत की ओर रुख किया.

उत्पादन में भी बढ़ोतरी की उम्मीद

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी निदेशक बीवी मेहता के अनुसार, 2026 में भारत का सरसों उत्पादन 3.6 फीसदी बढ़कर 11.94 मिलियन टन तक पहुंच सकता है, जो एक रिकॉर्ड स्तर होगा. अगर ऐसा होता है, तो यह किसानों और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए अच्छी खबर होगी.

किसानों के लिए मौका और चुनौती

इस समय किसानों के लिए यह एक अच्छा मौका है, क्योंकि उन्हें बाजार में बेहतर कीमत मिल रही है. लेकिन दूसरी ओर, बाजार की यह तेजी अंतरराष्ट्रीय हालात पर निर्भर है. अगर वैश्विक स्थिति बदलती है, तो कीमतों में गिरावट भी आ सकती है.

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Published: 10 Apr, 2026 | 07:55 AM
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