ICAR का बड़ा लक्ष्य: 2030 तक पॉपकॉर्न आयात पर लगेगा पूर्ण विराम, 810 करोड़ रुपये की होगी बचत

अब पॉपकॉर्न मक्का की खेती किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बनती जा रही है. हजारों किसान इससे जुड़ चुके हैं और अच्छी कमाई भी कर रहे हैं. करीब 17,500 किसान इस खेती से जुड़े हैं और 36,000 एकड़ से ज्यादा जमीन पर इसकी खेती हो रही है.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 26 Mar, 2026 | 08:10 AM

India popcorn production: एक समय था जब भारत में जो पॉपकॉर्न हम खाते थे, वह ज्यादातर विदेशों से आता था. देश में इसका उत्पादन बहुत कम था और पूरी तरह आयात पर निर्भरता थी. लेकिन अब धीरे-धीरे हालात बदल रहे हैं. खेती में नई तकनीक, वैज्ञानिकों की मेहनत और किसानों की भागीदारी ने पॉपकॉर्न को भी आत्मनिर्भर बनने की राह पर ला दिया है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव डॉ. एम.एल. जाट के अनुसार, सरकार और वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि साल 2030 तक भारत पॉपकॉर्न के आयात को पूरी तरह खत्म कर दे, जिससे करीब 810 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकेगी.

तेजी से बढ़ा उत्पादन, बदली तस्वीर

इकोनॉमिक्स टाइम्स की खबर के अनुसार, पिछले कुछ सालों में पॉपकॉर्न मक्का के उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है.

  • 2014-15 में उत्पादन करीब 50 हजार टन था
  • अब 2025-26 में यह बढ़कर 1.30 लाख टन हो गया है
  • आने वाले समय में इसे 1.80 लाख टन तक ले जाने की तैयारी है

आज भारत अपनी जरूरत का लगभग 70 फीसदी पॉपकॉर्न खुद ही तैयार कर रहा है, जो पहले पूरी तरह बाहर से आता था.

देसी बीजों ने बदला खेल

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई किस्में. ये पॉपकॉर्न मक्का की ऐसी किस्में हैं जो ज्यादा उत्पादन देती हैं, बीमारियों से लड़ सकती हैं और अच्छी क्वालिटी का पॉपकॉर्न तैयार करती हैं. यानी किसान भी खुश और बाजार भी संतुष्ट ,दोनों का फायदा हो रहा है.

किसानों के लिए नया मौका

अब पॉपकॉर्न मक्का की खेती किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बनती जा रही है. हजारों किसान इससे जुड़ चुके हैं और अच्छी कमाई भी कर रहे हैं. करीब 17,500 किसान इस खेती से जुड़े हैं और 36,000 एकड़ से ज्यादा जमीन पर इसकी खेती हो रही है.

किसानों को सिर्फ बीज ही नहीं, बल्कि खेती के सही तरीके, बाजार की जानकारी और तकनीकी मदद भी मिल रही है. इससे उन्हें जोखिम कम और फायदा ज्यादा हो रहा है.

कंपनियों के साथ मिलकर काम

इस क्षेत्र में निजी कंपनियां भी किसानों के साथ मिलकर काम कर रही हैं. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए किसानों को पहले से पता होता है कि उनकी फसल कहां बिकेगी और कितने दाम मिलेंगे. इससे किसानों को नुकसान का डर कम हो जाता है और उनकी आय स्थिर रहती है.

अब सिर्फ खेती नहीं, पूरा कारोबार

आज पॉपकॉर्न सिर्फ एक खाने की चीज नहीं रह गया है, बल्कि एक पूरा बिजनेस बन चुका है. बीज से लेकर पैकेजिंग और मार्केटिंग तक हर स्तर पर काम हो रहा है. इससे एक मजबूत सप्लाई सिस्टम तैयार हो गया है, जो किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए फायदेमंद है.

आगे निर्यात की भी उम्मीद

अगर उत्पादन इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में भारत पॉपकॉर्न का निर्यात भी शुरू कर सकता है. यानी जो पॉपकॉर्न पहले हम बाहर से मंगाते थे, वही अब दूसरे देशों में भेजा जा सकता है, यह देश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी.

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Published: 26 Mar, 2026 | 08:09 AM
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