देश में चावल की बंपर आवक से भरे गोदाम, सरकार अब सीधे जनता तक बेचने की तैयारी में
सरकार ने सरप्लस चावल को खपाने के लिए कुछ कदम पहले ही उठाए हैं. चावल से एथेनॉल बनाने की अनुमति दी गई है और इसके लिए बड़ी मात्रा में अनाज आवंटित किया गया है. सरकार ने रियायती दर पर चावल उपलब्ध कराया, ताकि डिस्टिलरी प्लांट इसका इस्तेमाल करें और केंद्रीय भंडार से कुछ दबाव कम हो सके.
Record rice surplus: देश में इस समय चावल का ऐसा भंडार जमा हो गया है, जो अब तक के सभी रिकॉर्ड तोड़ चुका है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केंद्रीय पूल में धान और चावल का स्टॉक अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है. इस हालात ने सरकार के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है इतनी बड़ी मात्रा में मौजूद अनाज को कैसे निकाला जाए, ताकि भंडारण का दबाव कम हो और नुकसान से बचा जा सके. इसी वजह से अब सरकार आम लोगों तक सीधे चावल बेचने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रही है.
अनाज का पहाड़
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2026 की शुरुआत तक केंद्रीय पूल में धान के रूप में मौजूद चावल को मिलाकर कुल चावल भंडार लगभग 679 लाख टन तक पहुंच चुका है. इसमें अकेले चावल का हिस्सा करीब 370 लाख टन के बराबर बताया जा रहा है. यह मात्रा न केवल बफर मानकों से कई गुना अधिक है, बल्कि देश की सालाना जरूरतों से भी कहीं ज्यादा है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के तहत देश को साल भर में करीब 410 लाख टन चावल की जरूरत पड़ती है. इसके मुकाबले मौजूदा स्टॉक बहुत बड़ा है.
सरल शब्दों में कहें तो सरकार के पास जितना चावल रखा है, वह जरूरत से कहीं अधिक है और अगर इसे समय पर बाहर नहीं निकाला गया तो भंडारण, गुणवत्ता और लागत तीनों स्तरों पर परेशानी बढ़ सकती है.
खरीद बढ़ी, खपत धीमी
पिछले कुछ वर्षों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद लगातार बढ़ी है. किसानों ने भी भरोसे के साथ सरकारी खरीद में हिस्सा लिया, जिससे गोदाम तेजी से भरते चले गए. वहीं दूसरी ओर चावल की मांग में वह तेजी नहीं दिखी, जिसकी उम्मीद थी. मुफ्त राशन और पीडीएस के बावजूद खपत का स्तर स्थिर बना हुआ है. यही वजह है कि स्टॉक हर साल और बड़ा होता जा रहा है.
एथेनॉल और रियायती बिक्री की कोशिश
सरकार ने सरप्लस चावल को खपाने के लिए कुछ कदम पहले ही उठाए हैं. चावल से एथेनॉल बनाने की अनुमति दी गई है और इसके लिए बड़ी मात्रा में अनाज आवंटित किया गया है. सरकार ने रियायती दर पर चावल उपलब्ध कराया, ताकि डिस्टिलरी प्लांट इसका इस्तेमाल करें और केंद्रीय भंडार से कुछ दबाव कम हो सके. इसके बावजूद स्टॉक की रफ्तार के सामने यह उपाय नाकाफी साबित हो रहा है.
खुले बाजार में बिक्री की सीमाएं
खुले बाजार बिक्री योजना के तहत भी सरकार चावल बेचती रही है, लेकिन वहां भी सीमाएं हैं. पिछले साल के मुकाबले इस साल खुले बाजार में चावल की बिक्री की रफ्तार धीमी रही. सहकारी संस्थाओं और योजनाओं के जरिए जो चावल उठाया गया, वह अपेक्षा से कम रहा. इसका सीधा असर यह हुआ कि गोदामों में अनाज जस का तस पड़ा रहा.
सीधे उपभोक्ताओं तक चावल बेचने का विचार
अब सरकार उन विकल्पों पर गंभीरता से सोच रही है, जिनमें आम उपभोक्ताओं को सीधे चावल बेचा जा सके. इसका मकसद दोहरा है एक तरफ सरकारी भंडार कम करना और दूसरी तरफ बाजार में चावल की कीमतों को स्थिर रखना. अगर सरकार सीमित मात्रा में सही कीमत पर चावल खुदरा स्तर पर उतारती है, तो इससे आम लोगों को राहत मिल सकती है और सरकार पर भंडारण का बोझ भी घटेगा.
हालांकि इस रास्ते में चुनौतियां भी कम नहीं हैं. खुदरा बिक्री के लिए मजबूत नेटवर्क, पारदर्शी व्यवस्था और राज्यों के साथ तालमेल जरूरी होगा. इसके बिना यह कदम सफल नहीं हो पाएगा.
भंडारण क्षमता पर बढ़ता दबाव
देश में भले ही भंडारण क्षमता बढ़ाई गई हो, लेकिन मौजूदा स्टॉक उस सीमा के करीब पहुंच चुका है. सरकारी गोदामों और राज्य एजेंसियों के पास जो कवर क्षमता है, वह भी अब धीरे-धीरे भर रही है. इसके साथ ही मिलों से चावल की डिलीवरी और बिना कुटा धान का प्रबंधन भी एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है. लंबे समय तक अनाज रखने से गुणवत्ता पर असर पड़ने का खतरा भी रहता है.
खेती की दिशा पर उठते सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल स्टॉक निकालने पर ध्यान देने से काम नहीं चलेगा. जरूरी है कि धान की खरीद नीति को फसल विविधीकरण से जोड़ा जाए. अगर कुछ इलाकों में धान के बजाय दूसरी फसलों को बढ़ावा दिया जाए, तो भविष्य में इस तरह का भारी सरप्लस बनने से बचा जा सकता है. इसके लिए कृषि और खाद्य मंत्रालयों को मिलकर दीर्घकालीन रणनीति बनाने की जरूरत है.