भारत में बढ़ सकती है एथेनॉल ब्लेंडिंग, चीनी निर्यात पर लग सकती है रोक… कीमतों पर भी पड़ेगा असर

अगर भारत चीनी निर्यात कम करता है, तो इसका असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ेगा. रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में चीनी की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो सकती है. साल की शुरुआत में कीमतें जहां कम थीं, वहीं आगे चलकर इनमें बढ़त देखने को मिल सकती है.

नई दिल्ली | Published: 6 Apr, 2026 | 07:42 AM

Sugar export: भारत में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिलाने की योजना अब नए चरण में प्रवेश कर रही है. सरकार पहले ही E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर चुकी है और अब इसे और आगे बढ़ाने पर विचार चल रहा है. लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ गया है अगर एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ेगा, तो क्या देश को चीनी के निर्यात पर रोक लगानी पड़ेगी?

दरअसल, एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और उससे बनने वाली चीनी का इस्तेमाल होता है. ऐसे में अगर एथेनॉल की मांग बढ़ती है, तो स्वाभाविक है कि देश के अंदर ही ज्यादा चीनी खपत होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में भारत को चीनी के निर्यात को सीमित करना पड़ सकता है, ताकि घरेलू जरूरतें पूरी हो सकें और कीमतें काबू में रहें.

पहले भी लग चुकी है रोक, अब फिर वही स्थिति?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, भारत इस तरह की स्थिति पहले भी देख चुका है. 2022-23 के सीजन में देश में चीनी की कमी हो गई थी, जिसके चलते सरकार ने निर्यात पर रोक लगा दी थी. इसके बाद 2023-24 में उत्पादन अच्छा रहा, लेकिन फिर भी सरकार ने निर्यात की अनुमति नहीं दी. इसका मकसद यही था कि देश में चीनी की उपलब्धता बनी रहे और कीमतें ज्यादा न बढ़ें.

अब एक बार फिर ऐसा ही माहौल बनता दिख रहा है. अगर एथेनॉल ब्लेंडिंग 20 प्रतिशत से ऊपर जाती है, तो चीनी का बड़ा हिस्सा इसी काम में इस्तेमाल होगा और निर्यात अपने आप सीमित हो जाएगा.

निर्यात के ताजा आंकड़े क्या कहते हैं

हाल के आंकड़े बताते हैं कि सरकार पहले से ही सतर्क है. 2024-25 में 10 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी गई थी, जिसमें से लगभग 9 लाख टन ही निर्यात हो पाया. वहीं चालू सीजन में 15.9 लाख टन निर्यात की मंजूरी दी गई है, लेकिन मार्च तक सिर्फ 3.6 लाख टन ही बाहर भेजा जा सका है. इससे साफ है कि सरकार घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दे रही है.

किसानों का बकाया भी बड़ी चिंता

इस पूरे मामले में सबसे अहम बात गन्ना किसानों का बकाया भुगतान है. मौजूदा सीजन में करीब 16,918 करोड़ रुपये का भुगतान अभी बाकी है. हालांकि मिलों ने कुल बकाया का लगभग 84 प्रतिशत चुका दिया है, लेकिन बची हुई राशि अभी भी बड़ी है. अगर चीनी मिलें ज्यादा एथेनॉल बनाएंगी, तो उनकी आमदनी बढ़ेगी और इससे किसानों का भुगतान भी तेजी से हो सकता है. यही वजह है कि सरकार एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है.

एथेनॉल उत्पादन की पूरी क्षमता अभी इस्तेमाल नहीं

दिलचस्प बात यह है कि देश में एथेनॉल बनाने की क्षमता काफी ज्यादा है, लेकिन उसका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा. ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने करीब 288 करोड़ लीटर एथेनॉल का ऑर्डर दिया है, जबकि मिलों की क्षमता लगभग 1000 करोड़ लीटर सालाना है. यानी अभी भी काफी संभावनाएं बाकी हैं. मार्च तक इन ऑर्डर्स का आधे से भी कम यानी करीब 46 प्रतिशत ही सप्लाई हो पाई है. इससे साफ है कि उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है.

दुनिया में बढ़ सकती हैं चीनी की कीमतें

अगर भारत चीनी निर्यात कम करता है, तो इसका असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ेगा. रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में चीनी की कीमतों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हो सकती है. साल की शुरुआत में कीमतें जहां कम थीं, वहीं आगे चलकर इनमें बढ़त देखने को मिल सकती है.

मौसम भी बन सकता है बड़ी वजह

इस पूरे समीकरण में मौसम भी अहम भूमिका निभाता है. एल नीनो जैसे हालात अगर बनते हैं, तो बारिश कम होती है और गन्ने की पैदावार प्रभावित होती है. 2023 में ऐसा ही हुआ था, जब उत्पादन में गिरावट आई थी और इसका असर अगले साल की चीनी सप्लाई पर भी पड़ा.

दरअसल, भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे ईंधन की जरूरत, किसानों का हित और आम लोगों के लिए कीमतों का संतुलन…तीनों को साथ लेकर चलना होगा. एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाना देश के लिए फायदेमंद है, लेकिन इसके लिए चीनी के इस्तेमाल और निर्यात के बीच सही संतुलन बनाना भी उतना ही जरूरी है.

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