भारतीय बाजार में अमेरिकी सेब की एंट्री होगी सीमित, सरकार बनाएगी नई नीति

भारत अमेरिका से हर साल अधिकतम एक लाख टन तक सेब आयात करने की अनुमति दे सकता है. इस आयात पर करीब 25 प्रतिशत की रियायती सीमा शुल्क लगाने का विचार है. खास बात यह है कि यह शुल्क अन्य देशों से आने वाले सेब पर लगने वाले शुल्क से लगभग आधा होगा. सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से कुल आयात मात्रा मौजूदा स्तर, यानी करीब 5.5 लाख टन के आसपास ही बनी रहेगी.

नई दिल्ली | Updated On: 10 Feb, 2026 | 07:44 AM

India US trade deal: भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है, जिसका असर अब सेब के कारोबार पर साफ दिखाई दे सकता है. सरकार ऐसे संकेत दे रही है कि अमेरिका से आने वाले सेब के आयात पर एक तय सीमा लागू की जा सकती है, ताकि घरेलू किसानों के हित सुरक्षित रहें और बाजार में संतुलन बना रहे. इस प्रस्ताव को लेकर सेब उत्पादक राज्यों से लेकर व्यापारियों तक, हर स्तर पर चर्चा तेज हो गई है.

सूत्रों के मुताबिक, भारत अमेरिका से हर साल अधिकतम एक लाख टन तक सेब आयात करने की अनुमति दे सकता है. इस आयात पर करीब 25 प्रतिशत की रियायती सीमा शुल्क लगाने का विचार है. खास बात यह है कि यह शुल्क अन्य देशों से आने वाले सेब पर लगने वाले शुल्क से लगभग आधा होगा. सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से कुल आयात मात्रा मौजूदा स्तर, यानी करीब 5.5 लाख टन के आसपास ही बनी रहेगी. फर्क सिर्फ इतना होगा कि ईरान, तुर्किये या मिस्र जैसे देशों की हिस्सेदारी कुछ कम हो सकती है और अमेरिका का हिस्सा बढ़ सकता है.

न्यूनतम आयात मूल्य से किसानों को सुरक्षा

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सरकार इस व्यवस्था के साथ न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) को भी अहम हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है. प्रस्ताव है कि अमेरिका से आने वाले सेब के लिए एमआईपी 80 रुपये प्रति किलो तय किया जाए. इससे सस्ते दाम पर सेब की डंपिंग रुक सकेगी. फिलहाल सभी देशों से आयातित सेब पर 50 प्रतिशत शुल्क और 50 रुपये प्रति किलो का एमआईपी लागू है, जिससे इन सेबों की लागत करीब 75 रुपये प्रति किलो बैठती है.

सरकार का पक्ष

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने साफ किया है कि सरकार ने घरेलू सेब उत्पादकों के हितों से कोई समझौता नहीं किया है. एमआईपी और आयात शुल्क जैसे प्रावधान इसी सोच के तहत रखे गए हैं. उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिका से सेब का आयात मौजूदा स्तर से ज्यादा नहीं होने दिया जाएगा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में भारत ने अमेरिका से करीब 34 हजार टन सेब आयात किए थे, जबकि इससे पहले साल यह आंकड़ा लगभग 20 हजार टन था.

सेब उत्पादक राज्यों की बढ़ती चिंता

हालांकि, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे प्रमुख सेब उत्पादक राज्यों में इस प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई जा रही है. हिमाचल प्रदेश मार्केटिंग एंड प्रोसेसिंग कॉरपोरेशन के पूर्व अध्यक्ष और सेब किसान प्रकाश ठाकुर का कहना है कि अगर आयातित सेब की लैंडेड लागत करीब 100 रुपये प्रति किलो तय होती है और दिल्ली जैसे बड़े बाजारों में इसे 150 रुपये प्रति किलो में बेचा जाता है, तो इससे स्थानीय किस्मों पर दबाव पड़ेगा. उनका कहना है कि किन्नौर जैसी किस्में, जो अभी 200 रुपये प्रति किलो तक बिकती हैं, उन्हें मजबूरन सस्ते दाम पर बेचना पड़ सकता है.

उत्पादन और सब्सिडी का बड़ा अंतर

सेब किसानों का एक बड़ा तर्क यह भी है कि भारत और अमेरिका के बीच उत्पादन क्षमता में जमीन-आसमान का फर्क है. अमेरिका में सेब की पैदावार 60 से 70 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है, जबकि हिमाचल प्रदेश में यह सिर्फ 6 से 7 टन और जम्मू-कश्मीर में 10 से 12 टन प्रति हेक्टेयर है. इसके अलावा, अमेरिकी किसानों को कई तरह की अप्रत्यक्ष सब्सिडी और मजबूत मार्केटिंग सपोर्ट मिलता है, जबकि भारतीय किसानों को ऐसा सहयोग नहीं मिल पाता.

प्रधानमंत्री से की गई अपील

कश्मीर घाटी के सेब उत्पादकों और व्यापारियों ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर अमेरिकी और यूरोपीय सेब पर 100 प्रतिशत से ज्यादा आयात शुल्क लगाने की मांग की है. उनका कहना है कि मुक्त व्यापार समझौतों के तहत शुल्क में की गई कटौती से स्थानीय उत्पादकों को नुकसान हो रहा है और मौजूदा नीति उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे पा रही है.

बाजार की दूसरी तस्वीर

दूसरी ओर, देश के कुछ बाजारों से अलग राय भी सामने आ रही है. चेन्नई के एक सेब व्यापारी का कहना है कि अमेरिकी वॉशिंगटन सेब की कीमत थोक बाजार में पहले से ही ज्यादा है और भारतीय सेब को ग्राहक आज भी प्राथमिकता देते हैं. असली समस्या यह है कि देश में कोल्ड स्टोरेज और बेहतर ढांचागत सुविधाओं की कमी के कारण भारतीय सेब साल में सिर्फ चार महीने ही बड़े पैमाने पर उपलब्ध रह पाते हैं.

क्या हो सकता है असर?

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि अगर सभी देशों के लिए एमआईपी बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलो कर दिया गया, तो अमेरिका को छोड़कर बाकी देशों से आने वाले सेब और महंगे हो जाएंगे, क्योंकि उन पर 50 प्रतिशत शुल्क लगेगा. इससे आयात का कुछ हिस्सा अमेरिका की ओर शिफ्ट हो सकता है. सरकार का दावा है कि इस नीति से न तो घरेलू किसानों को बड़ा नुकसान होगा और न ही बाजार में सेब के दाम अचानक गिरेंगे, बल्कि एक संतुलित व्यवस्था बनी रहेगी.

Published: 10 Feb, 2026 | 07:43 AM

Topics: