भारत-अमेरिका डील से बदलेगा चावल का खेल, थाईलैंड-पाकिस्तान को मिलेगी कड़ी टक्कर

टैरिफ में कटौती का असर सिर्फ बासमती चावल तक सीमित नहीं रहेगा. निर्यातक मानते हैं कि इससे नॉन-बासमती चावल की बिक्री को भी बढ़ावा मिलेगा. भारतीय चावल अपनी गुणवत्ता, स्वाद और स्थिर आपूर्ति के लिए जाना जाता है. अब जब कीमत का अंतर कम होगा, तो अमेरिकी बाजार में इसकी मांग और तेज हो सकती है.

नई दिल्ली | Updated On: 4 Feb, 2026 | 08:29 AM

भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते ने भारतीय चावल उद्योग में नई उम्मीद जगा दी है. लंबे समय से ऊंचे टैरिफ की मार झेल रहे भारतीय चावल निर्यातकों के लिए यह फैसला राहत भरा माना जा रहा है. चावल निर्यातकों का कहना है कि इस समझौते से अमेरिकी बाजार में भारतीय चावल की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति फिर से मजबूत होगी और थाईलैंड व पाकिस्तान जैसे देशों के बराबर खड़ा होने का मौका मिलेगा.

टैरिफ घटने से भारतीय चावल को मिलेगा फायदा

द ट्रिब्यून के अनुसार, भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (IREF) के अनुसार, अमेरिका द्वारा टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करना भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा बदलाव है. इससे पहले ऊंचे शुल्क के कारण भारतीय चावल की कीमत अमेरिकी बाजार में काफी बढ़ गई थी. अब टैरिफ घटने से भारतीय चावल की लैंडेड कीमत कम होगी, जिससे खरीदारों के लिए यह फिर से आकर्षक विकल्प बन जाएगा.

महासंघ का कहना है कि थाईलैंड और पाकिस्तान से आने वाले चावल पर अमेरिका में करीब 19 प्रतिशत टैरिफ लगता है. ऐसे में भारत को भी अब लगभग वही स्थिति मिल गई है, जिसे व्यापार की भाषा में “टैरिफ समानता” कहा जा रहा है. इससे भारतीय चावल को सीधे तौर पर प्रतिस्पर्धा में बढ़त मिलेगी.

रिकॉर्ड उत्पादन के बीच आया बड़ा मौका

IREF के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रेम गर्ग के मुताबिक, यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारत में चावल का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर है. अनुमान है कि इस सीजन में देश में करीब 149 मिलियन मीट्रिक टन चावल का उत्पादन होगा. घरेलू बाजार में उपलब्धता मजबूत है और किसानों को भी फसल का अच्छा समर्थन मिल रहा है. ऐसे में निर्यात बढ़ने से किसानों और कारोबारियों, दोनों को फायदा होने की उम्मीद है.

उनका कहना है कि भारतीय कृषि उत्पाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का अहम हिस्सा बने हुए हैं. बीते समय में जब टैरिफ 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया था, तब भी अमेरिका में भारतीय चावल की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई. इससे यह साफ होता है कि अमेरिकी उपभोक्ताओं और खरीदारों के लिए भारतीय चावल अब भी जरूरी बना हुआ है.

बासमती और नॉन-बासमती दोनों को फायदा

टैरिफ में कटौती का असर सिर्फ बासमती चावल तक सीमित नहीं रहेगा. निर्यातक मानते हैं कि इससे नॉन-बासमती चावल की बिक्री को भी बढ़ावा मिलेगा. भारतीय चावल अपनी गुणवत्ता, स्वाद और स्थिर आपूर्ति के लिए जाना जाता है. अब जब कीमत का अंतर कम होगा, तो अमेरिकी बाजार में इसकी मांग और तेज हो सकती है.

IREF का कहना है कि टैरिफ में यह बदलाव भारतीय निर्यातकों को न केवल अपनी मौजूदा हिस्सेदारी बचाने में मदद करेगा, बल्कि बाजार का विस्तार करने का भी मौका देगा. इससे निर्यात की मात्रा बढ़ सकती है और बेहतर दाम मिलने की संभावना भी बनेगी.

व्यापार संतुलन और वैश्विक संकेत

महासंघ ने ईरान के साथ भारत के व्यापार को लेकर उठ रही चिंताओं पर भी प्रतिक्रिया दी है. उनका कहना है कि बदलते वैश्विक व्यापार ढांचे अक्सर रणनीतिक संतुलन का हिस्सा होते हैं. फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि ईरान के साथ भारत के चावल व्यापार में कोई बड़ी रुकावट आएगी. निर्यात प्रवाह सामान्य रहने की उम्मीद जताई गई है.

IREF के उपाध्यक्ष देव गर्ग ने कहा कि महासंघ सरकार और निर्यातकों के साथ लगातार संपर्क में रहेगा, ताकि किसी भी प्रक्रिया में बदलाव के लिए कारोबारी पहले से तैयार रहें. उनका जोर स्थिर और नियम आधारित व्यापार व्यवस्था पर है, जिससे उपभोक्ताओं और पूरी सप्लाई चेन को फायदा मिले.

Published: 4 Feb, 2026 | 08:30 AM

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