दालों का आयात इस साल 45 फीसदी तक घटने के आसार, मजबूत भंडार और बेहतर खेती बनी वजह

केवल मात्रा ही नहीं, बल्कि दालों के आयात पर होने वाला खर्च भी तेजी से घटा है. चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में भारत ने दालों का आयात करीब 1.56 अरब डॉलर का किया, जो पिछले साल इसी अवधि के 2.83 अरब डॉलर के मुकाबले 45 प्रतिशत कम है.

नई दिल्ली | Published: 20 Dec, 2025 | 11:51 AM

Pulses Import: देश में दालों को लेकर लंबे समय से यह चिंता बनी रहती थी कि जरूरत पूरी करने के लिए भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है. लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है. चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के दाल आयात में करीब 45 प्रतिशत की बड़ी गिरावट आने का अनुमान है. जहां पिछले साल दालों का आयात रिकॉर्ड स्तर 7.34 मिलियन टन तक पहुंच गया था, वहीं इस साल यह घटकर लगभग 4 मिलियन टन रहने की संभावना जताई जा रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह मजबूत घरेलू फसल, पर्याप्त भंडार और सरकार की आत्मनिर्भरता पर केंद्रित नीति मानी जा रही है.

शुरुआती महीनों में ही दिखा असर

फाइनेंशियल एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, सरकारी और व्यापारिक आंकड़े बताते हैं कि इस गिरावट के संकेत साल की शुरुआत से ही मिलने लगे थे. अप्रैल से अक्टूबर 2025-26 के बीच दालों का आयात मात्रा के लिहाज से 33 प्रतिशत घटकर 2.37 मिलियन टन रह गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 3.54 मिलियन टन था. जानकारों का कहना है कि नवंबर और दिसंबर के दौरान करीब 0.5 मिलियन टन आयात का अनुमान है और पूरे वित्त वर्ष में कुल आयात लगभग 4 मिलियन टन पर सिमट सकता है.

घरेलू फसल से बढ़ा भरोसा

सतीश उपाध्याय, सचिव India Pulses and Grains Association, के मुताबिक देश में दालों की घरेलू फसल की स्थिति काफी मजबूत है. पहले के वर्षों में ज्यादा आयात के कारण जो भंडार बने थे, वे भी अब काम आ रहे हैं. इसी वजह से बाजार में किसी तरह की सप्लाई की कमी नहीं है और आयात पर निर्भरता अपने आप कम होती जा रही है.

आयात मूल्य में भी तेज गिरावट

केवल मात्रा ही नहीं, बल्कि दालों के आयात पर होने वाला खर्च भी तेजी से घटा है. चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों में भारत ने दालों का आयात करीब 1.56 अरब डॉलर का किया, जो पिछले साल इसी अवधि के 2.83 अरब डॉलर के मुकाबले 45 प्रतिशत कम है. अधिकारियों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर उत्पादन बढ़ने और भारत की मांग घटने से अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 30 से 40 प्रतिशत तक की नरमी आई है, जिससे आयात बिल भी घट गया है.

अलग-अलग दालों की स्थिति

अगर किस्मों की बात करें तो अरहर और मसूर के आयात में साफ गिरावट दर्ज की गई है. अप्रैल से अक्टूबर के बीच अरहर का आयात 22 प्रतिशत घटकर 0.81 मिलियन टन और मसूर का आयात 37 प्रतिशत घटकर 0.5 मिलियन टन रह गया. हालांकि उड़द के आयात में इस दौरान 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई और यह 0.64 मिलियन टन तक पहुंच गया. इससे साफ है कि मांग के हिसाब से कुछ दालों में आयात अभी भी जरूरी बना हुआ है.

रबी सीजन से बढ़ी उम्मीद

इस साल अच्छी बारिश के कारण मिट्टी में नमी पर्याप्त है, जिससे रबी सीजन में चना, मसूर और मूंग की पैदावार बढ़ने की उम्मीद है. अब तक दालों की बुवाई का रकबा 11.71 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच चुका है और मौसम भी फसलों के अनुकूल बना हुआ है. सरकार के पास करीब 2 मिलियन टन का बफर स्टॉक भी मौजूद है, जिसे पर्याप्त माना जा रहा है.

आगे की रणनीति और लक्ष्य

2024-25 फसल वर्ष में दालों का उत्पादन 25.68 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल से 6 प्रतिशत अधिक है. सरकार 2025-26 में इसे बढ़ाकर 27 मिलियन टन तक ले जाने का लक्ष्य रख रही है. इसके अलावा 11,440 करोड़ रुपये के ‘दाल आत्मनिर्भरता मिशन’ के तहत 2030-31 तक उत्पादन 35 मिलियन टन तक पहुंचाने की योजना है. मौजूदा हालात को देखते हुए कहा जा सकता है कि दालों के आयात में गिरावट भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम आगे ले जा रही है.

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