UP के आम किसानों की कमाई हो सकती है फीकी, आंध्र प्रदेश से निर्यात ठप.. जानें क्या है वजह

बीमा कंपनियों ने भी अपने चार्ज सामान्य दरों के मुकाबले 3-4 गुना बढ़ा दिए हैं, जिससे एक्सपोर्ट का मुनाफा काफी कम हो गया है. अब 7.4 टन के एक कंटेनर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स को बहुत ही कम लाभ मिल रहा है. गोदामों में जमा स्टॉक निकालने के लिए कई यूनिट्स कम कीमत पर पल्प बेचने की कोशिश कर रही हैं.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 20 Apr, 2026 | 02:19 PM

Mango Export: ईरान- इजरायल के बीच जारी जंग के चलते भारत के कारोबार पर असर पड़ा है. खासकर खाद्य निर्यात प्रभावित हुआ है. कहा जा रहा है मौजूदा टेंशन के चलते खाड़ी देशों को भेजा जाने वाला प्रोसेस्ड आम का पल्प बीच रास्ते में ही रुक गया है. कई बंदरगाह पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे, जिससे 90 फीसदी से ज्यादा स्टॉक गोदामों और पोर्ट वेयरहाउस में फंसा हुआ है. ऐसे में आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले से होने वाला आम पल्प का निर्यात लगभग ठप हो गया है.

ऐसे में उत्तर भारत के आम किसानों और निर्यातकों की भी चिंता बढ़ गई है. उत्तर प्रदेश के आम निर्यातकों और किसानों का कहना है कि मई से दशहरी और लंगड़ा का उत्पादन शुरू हो जाएगा. लखनऊ और वाराणसी से दशहरी व लंगड़ा आम का निर्यात खाड़ी देशों में होता है. अगर ईरान- इजरायल के बीच टेंशन दो-तीन महीनों तक जारी रही, तो आंध्र प्रदेश की तरह उत्तर प्रदेश के भी आम किसानों की कमाई पर असर पड़ सकता है. ऐसे भी यहां के किसान बेमौसम बारिश की मार झेल रहे हैं. इससे फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है.

विदेशी खरीदारों से भुगतान नहीं मिल रहा है

आंध्र प्रदेश में इस सीजन में हालात और भी खराब दिख रहे हैं. प्रोसेसिंग यूनिट मालिकों का कहना है कि उन्हें विदेशी खरीदारों से भुगतान नहीं मिला है, इसलिए वे किसानों से आम खरीद ही नहीं पा रहे. चित्तूर, जो प्रोसेस्ड आम उत्पादों  का बड़ा हब माना जाता है, वहां की पूरी इंडस्ट्री गहरे संकट में है. 3 लाख टन से ज्यादा आम का पल्प अभी गोदामों और पोर्ट पर अटका हुआ है. साथ ही, कंटेनर कंपनियों ने खाड़ी देशों में शिपमेंट के लिए हर कंटेनर पर 2000 डॉलर का अतिरिक्त ‘वॉर रिस्क चार्ज’ भी लगा दिया है, जिससे कारोबारियों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.

बीमा कंपनियों ने भी अपने चार्ज 3-4 गुना बढ़ा दिए

इसके अलावा, बीमा कंपनियों ने भी अपने चार्ज सामान्य दरों के मुकाबले 3-4 गुना बढ़ा दिए हैं, जिससे एक्सपोर्ट का मुनाफा काफी कम हो गया है. अब 7.4 टन के एक कंटेनर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स  को बहुत ही कम लाभ मिल रहा है. गोदामों में जमा स्टॉक निकालने के लिए कई यूनिट्स कम कीमत पर पल्प बेचने की कोशिश कर रही हैं. आमतौर पर सीजन में 6- 7 लाख टन आम किसानों से खरीदे जाते हैं, जिससे करीब 3-4 लाख टन पल्प तैयार होता है, जिसमें ज्यादातर तोतापुरी किस्म शामिल होती है. कुल उत्पादन का लगभग 70 फीसदी पल्प खाड़ी और यूरोपीय देशों को निर्यात किया जाता है, जबकि बाकी 30 फीसदी घरेलू बाजार में बिकता है.

पश्चिम एशिया संकट की वजह से लॉजिस्टिक्स की लागत भी बढ़ गई

पश्चिम एशिया संकट की वजह से लॉजिस्टिक्स की लागत भी बढ़ गई है. अब अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को ध्यान में रखते हुए पल्प को पुराने OTS टिन की बजाय 215 किलो के सिक्स-लेयर एसेप्टिक बैग में एक्सपोर्ट किया जा रहा है. ऑल इंडिया फूड प्रोसेसर्स एसोसिएशन (साउथ जोन) के चेयरमैन कट्टमांची गोवर्धन बॉबी ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि भारत दुनिया में आम के पल्प का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है, जिसमें लगभग 70 फीसदी एक्सपोर्ट अकेले चित्तूर से होता है. लेकिन पश्चिम एशिया के संकट के कारण लॉजिस्टिक्स लागत काफी बढ़ गई है, जिससे एक्सपोर्टर्स के मुनाफे पर बुरा असर पड़ा है.

यूरोपीय देशों को होने वाला निर्यात भी प्रभावित हुआ

उन्होंने यह भी कहा कि लाल सागर में हूथी के हमलों की वजह से यूरोपीय देशों को होने वाला निर्यात भी प्रभावित हुआ है. इस पूरे संकट से आम पल्प इंडस्ट्री को करीब 750 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. विदेशी खरीदारों से पेमेंट में देरी के चलते प्रोसेसिंग यूनिट्स को कैश फ्लो बनाए रखना भी मुश्किल हो रहा है. इस हालात का सीधा असर यह हुआ है कि प्रोसेसिंग यूनिट्स इस सीजन में किसानों से आम खरीदने में सक्षम नहीं हैं. इसका असर पूरी सप्लाई चेन पर पड़ रहा है और कारोबार धीमा हो गया है. एसोसिएशन ने सरकार को पत्र लिखकर तुरंत दखल और मदद की मांग की है, ताकि आम पल्प इंडस्ट्री इस संकट से उबर सके. दूसरी तरफ, इस इंडस्ट्री पर निर्भर किसान भी अब असमंजस में हैं. प्रोसेसिंग यूनिट्स की मांग घटने से उनके आम की बिक्री प्रभावित हो रही है और उन्हें अपने उत्पादन के लिए सही खरीदार नहीं मिल पा रहे हैं.

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Published: 20 Apr, 2026 | 02:12 PM
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