किसानों की अमानत के साथ खेती में खयानत, पहले बीमा में धोखाधड़ी अब फसल खरीद में घपलेबाजी

Crop Purchase Scam: सरकारी योजनाओं का पैसा एक प्रकार से सरकार की किसानों के हक संरक्षित अमानत है. यह अमानत किसानों की खेती को संवारने में इस्तेमाल की जानी चाहिए. लेकिन सच यह है कि सरकारी अमले का भ्रष्टाचार इस किसानों की अमानत के साथ खयानत साबित हो रहा है.

निर्मल यादव
नोएडा | Published: 26 Jan, 2026 | 08:09 PM
Fraud cases with Farmers: हाल ही में फसल बीमा योजना में भीषण भ्रष्टाचार की परतें खुलने के बाद अब किसानों से उपज की खरीद में भी गड़बड़ी के चौंकाने वाले कारनामे सामने आने लगे हैं. किसानों की जमीन के बजाए मंदिर, तालाब और जंगल की जमीन पर उगाई गई भ्रष्टाचार की फसल का बीमा कराने की खबरों ने खूब सुर्खियां बटोरी. किसानों की जमीनों के दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर कराए गए फसल बीमा का पैसा किसी अन्य जिले के निवासियों के बैंक खाते में जमा करा दिया गया. हद तो तब हो गई जब एक सांसद की जमीन के दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल कर फसल बीमा की राशि किसी और के खाते जमा करा दी गई.

सरकारी खरीद में हो रही गड़बड़ी के किस्से उजागर

फसल बीमा की ही तर्ज पर किसानों से उपज की सरकारी खरीद में हो रही गड़बड़ी के किस्से भी उजागर होने लगे हैं. इस समय खरीफ सीजन 2025 के लिए धान की खरीद चल रही है. धान की खरीद में गड़बड़ी की परतें उधेड़ने पर चौंकाने वाले मामले सामने आने लगे हैं. इनमें यूपी के आढ़तियों द्वारा किसानों से औने पौने दामों पर खरीदी गई धान ट्रकों में लाद कर हरियाणा के सरकारी खरीद केंद्रों में पहुंचने पर पिछले दिनों जमकर बवाल हुआ. इस मामले की जांच पूरी हो पाती, इस बीच यूपी के हरदोई जिले में फर्जी किसानों से कागजों पर ही धान की खरीद करके उन्हें भुगतान भी करने का मामला उजागर हुआ है. पता चला है कि 1380 भूमिहीन किसानों से 1.5 लाख कुंतल धान खरीद ली गई. इस मामले में जिले के 8 लेखपालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. अब सरकार इसकी जांच कर रही है.

कागजों में किसान पर हकीकत में भूमिहीन पाए गए

प्रारंभिक जांच में पता चला है कि इस मामले की जांच की जद में 11 गांव के 1380 किसान आए हैं. इसमें धान की खरीद तो किसानों से की गई, लेकिन जांच में वे भूमिहीन पाए गए. हैरत की बात यह है कि प्रति भूमिहीन किसान से औसतन 100 कुंतल से ज्यादा धान खरीद की गई. इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह रही कि धान की फर्जी किसानों से की गई ’आभासी खरीद’ का सत्यापन भी लेखपालों ने कर दिया. इन मामलों से साफ है कि भ्रष्टाचार के मामले में भी नवाचार का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है. यह सब तक हो रहा है जबकि सरकार द्वारा भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए ऑनलाइन संचार सेवाओं का हर स्तर पर प्रयोग किया जा रहा है.

भ्रष्टाचार की जड़ें गहराई तक पैठ बना चुकीं

गौरतलब है कि फसल बीमा से लेकर किसानों से उपज की खरीद करने तक, सरकार तमाम योजनाओं के माध्यम से किसानों का कल्याण करने की हरसंभव कोशिश करती रहती है. यह बात दीगर है कि इन योजनाओं पर खर्च हो रहे बेहिसाब पैसे का मामूली हिस्सा ही लक्षित वर्ग के किसानों तक पहुंच पाता है. एक पूर्व प्रधानमंत्री ने तो 4 दशक पहले ही यह बात खुल कर स्वीकार भी कर ली थी. किसानों और वंचित वर्ग के लोगों के कल्याण का पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, इस जमीनी हकीकत से वर्तमान दौर की सरकार भी बखूबी वाकिफ है. ऐसे में यह बात विचारणीय नहीं रह गई है कि भ्रष्टाचार समूची व्यवस्था का अविभाज्य अंग हो गया है. अब गौर इस बात पर फरमाया जाने लगा है कि कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार के क्षेत्र में भी नवाचार का कितना अहम स्थान है.

भ्रष्ट कर्मचारियों का दुस्साहस तकनीक पर हावी

अगर किसान कल्याण से जुड़ी योजनाओं की बात की जाए तो कृषि के क्षेत्र में जितनी तेजी से आधुनिक तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसी गति से निजी क्षेत्र का दखल खेत खलिहान से लेकर गांव देहात तक होने लगा है. सरकार तकनीक का भरपूर इस्तेमाल करके कम से कम किसानों के साथ हो रहे भ्रष्टाचार को रोकने के भरसक प्रयास करती है. लेकिन भ्रष्ट कर्मचारियों का दुस्साहस तकनीक पर हावी हो गया है. हालांकि किसान कल्याण की योजनाएं बनाने वाली सरकार और इन योजनाओं को लागू करने वाले सरकार के कर्मचारी अपने इर्द गिर्द फैले भ्रष्टाचार को बखूबी जानते हैं. लेकिन वे यह समझने में समर्थ नहीं हैं कि सरकारी योजनाओं का पैसा एक प्रकार से सरकार की किसानों के हक संरक्षित अमानत है. यह अमानत किसानों की खेती को संवारने में इस्तेमाल की जानी चाहिए. लेकिन सच यह है कि सरकारी अमले का भ्रष्टाचार इस किसानों की अमानत के साथ खयानत साबित हो रहा है.

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