क्या है पॉपकॉर्न मक्का और कैसे यह किसानों की आमदनी बढ़ाने वाला हाई-वैल्यू क्रॉप बन सकता है…

Gourmet Popcornica Pvt. Ltd. के मैनेजिंग डायरेक्टर एसबीपी पट्टाभि रामा राव का कहना है कि भारत में पॉपकॉर्न मक्का किसानों के लिए अच्छी कमाई वाली फसल बन सकती है. इसके लिए किसानों को अच्छी गुणवत्ता के बीज, तकनीकी मदद और फसल खरीद की गारंटी मिलनी चाहिए.

शैलेश चतुर्वेदी
नई दिल्ली | Updated On: 5 Jul, 2026 | 08:57 AM

आम मक्का और पॉपकॉर्न मक्का में कुछ बुनियादी फर्क हैं. अब तक विदेश पर निर्भर भारतीय खेती में पॉपकॉर्न मक्का का चलन बढ़ता जा रहा है. भारत में पॉपकॉर्न मक्का की खेती को संगठित रूप देने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल Gourmet Popcornica Pvt. Ltd. के मैनेजिंग डायरेक्टर एसबीपी पट्टाभि रामा राव का मानना है कि भारतीय कृषि आने वाले वर्षों में पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर हाई-वैल्यू और मार्केट-ड्रिवन खेती की ओर तेजी से बढ़ेगी. उनका कहना है कि अगर किसानों को बेहतर बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और फसल खरीद की गारंटी मिले तो पॉपकॉर्न मक्का जैसी विशेष फसलें उनकी आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. उन्होंने पॉपकॉर्न मक्का, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, कृषि में तकनीक, जलवायु परिवर्तन और किसानों के भविष्य पर विस्तार से बातचीत की.

आप अमेरिका के नेब्रास्का से पॉपकॉर्न मक्का की एक तकनीक भारत लाए. इसके पीछे क्या सोच थी और सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?

-जब हमने शुरुआत की, तब भारत उच्च गुणवत्ता वाले पॉपकॉर्न मक्का के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर था. हमें लगा कि देश में ही ऐसा इकोसिस्टम बनाया जा सकता है जो ग्लोबल क्वालिटी स्टैंडर्ड के बराबर हो और भारतीय किसानों को भी इसका फायदा मिले. नेब्रास्का दुनिया में पॉपकॉर्न मक्का कल्टिवेशन का प्रमुख केंद्र माना जाता है, इसलिए दुनिया की सबसे बड़ी पॉपकॉर्न मक्का उत्पादक कंपनियों में से एक प्रिफर्ड पॉपकॉर्न के साथ साझेदारी करने से हमें बेहतर बीजों की उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक खेती की आजमाई हुई तकनीकों का लाभ मिला.

सबसे बड़ी चुनौती इन किस्मों और तकनीकों को भारत की अलग-अलग जलवायु और मिट्टी के हिसाब से ढालना था. नेब्रास्का में जो तरीका काम करता है, वह आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ या उत्तर प्रदेश में उसी तरह कामयाब नहीं हो सकता. इसके लिए कई साल तक फील्ड ट्रायल, कृषि पद्धतियों में सुधार और किसानों के साथ लगातार काम करना पड़ा, जिसके बाद हमें कामयाबी मिली.

पॉपकॉर्न मक्का की खेती सामान्य मक्का की तुलना में इनवेस्टमेंट, उत्पादन और मुनाफे के लिहाज से कैसी है?

– इनवेस्टमेंट लगभग सामान्य मक्का जितना ही होता है, लेकिन पॉपकॉर्न मक्का एक खास फसल है, जिसकी अलग बाजार मांग और बेहतर कीमत मिलती है. यदि किसान को अच्छी गुणवत्ता का बीज, वैज्ञानिक खेती की सलाह और खरीद की गारंटी मिले तो वह सामान्य मक्का की तुलना में बेहतर आय प्राप्त कर सकता है.
सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमारे साथ जुड़ने पर किसान को पहले से खरीद मूल्य का पता होता है. वो एक स्ट्रक्चर्ड वेल्यू चेन के साथ जुड़ता है. इससे बाजार की अनिश्चितता काफी कम हो जाती है.

क्या छोटे और सीमांत किसान भी पॉपकॉर्न मक्का की खेती सफलतापूर्वक कर सकते हैं?

-बिल्कुल. अमेरिका से अलग भारत में अधिकांश किसानों के पास छोटी जोत है और हमारे सबसे कामयाब किसानों में से कई किसान छोटे और सीमांत की कैटेगरी में आएंगे, जो औसतन दो एकड़ जमीन पर ही खेती करते हैं. सफलता खेत के आकार पर नहीं, बल्कि अच्छी गुणवत्ता के बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और सुनिश्चित बाजार पर निर्भर करती है. छोटे किसान अक्सर नई तकनीक तेजी से अपनाते हैं क्योंकि उन्हें हर छोटा सा लाभ भी उनके लिए बहुत बड़ा फर्क लाने वाला होता है.

हाई-वैल्यू फसलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार को कौन-से नीति सुधार करने चाहिए?

सरकार को बाजार से जुड़ाव मजबूत करने, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देने, कृषि मशीनीकरण बढ़ाने और गुणवत्तापूर्ण प्लांटिंग मैटीरियल या बीज उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिए. किसान तभी नई फसल अपनाता है जब उसे बेहतर बाजार और उचित कीमत का भरोसा हो.

हम लगभग 20 हजार किसानों के साथ नौ राज्यों में काम कर रहे हैं. करीब 40 हजार एकड़ क्षेत्र में खेती करने वाले इन किसानों के साथ उनकी पसंदीदा भाषा में अनुबंध किए जाते हैं. उन्हें बीज, तकनीकी सहायता, मशीनीकरण और भुगतान सीधे बैंक खाते में उपलब्ध कराया जाता है.

अगले 10 वर्षों में भारतीय कृषि को आप किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?

– भारतीय कृषि अब केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी. आने वाले समय में वॉल्यूम ड्रिवेन की जगह वेल्यू ड्रिवेन प्रोडक्शन की तरफ जाएगी. आने वाले समय में विशेष फसलें, फूड प्रोसेसिंग, ट्रेसबिलिटी और निर्यात पर अधिक जोर होगा. निजी कृषि कंपनियां तकनीक, बाजार, वित्त और जोखिम प्रबंधन के जरिए इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी. भविष्य इस तरफ होता दिख रहा है, जहां किसान, सरकारी संस्थान और जिम्मेदार प्राइवेट कंपनियों के बीच मजबूत साझेदारी होगी.

उत्तर और दक्षिण भारत के किसानों में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

-यह अंतर अब तेजी से कम हो रहा है. पहले या परंपरागत तौर पर दक्षिण भारत के किसान तकनीक और प्रिसिजन फार्मिंग जल्दी अपनाते थे, जबकि उत्तर भारत में बड़े खेत और अधिक मशीनीकरण देखने को मिलता था. अब नई पीढ़ी के किसान पूरे देश में तकनीक अपनाने और नई फसलों के साथ प्रयोग करने के लिए तैयार हैं. वे डेटा ड्रिवेन, ऑन्त्रप्रिन्योरियल सोच वाले बनते जा रहे हैं.

आज भारतीय किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

– विदाउट डाउट, सबसे बड़ी चुनौती बाजार की अनिश्चितता है. इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे जलवायु परिवर्तन, छोटी जोत और खेती की बढ़ती लागत. लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि किसान को अपनी आय का भरोसा नहीं होता.

अगर किसान को यह विश्वास हो कि उसकी फसल का उचित और भरोसेमंद बाजार मिलेगा, तो वह नई तकनीक अपनाने और उत्पादन बढ़ाने में ज्यादा निवेश करेगा.
इसके अलावा, सरकार को पॉपकॉर्न मक्का पर मिनिमम इम्पोर्ट प्राइस (MIP) लागू करने पर भी विचार करना चाहिए, ताकि कम कीमत दिखाकर होने वाले आयात और दूसरे देशों की अतिरिक्त उपज की डंपिंग को रोका जा सके.

किसान सरकारी सहायता पर कम निर्भर कैसे बन सकते हैं?

किसानों को उत्पादन बढ़ाने, फसलों में विविधता लाने और मिलकर काम करने पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें किसान उत्पादक संगठनों से जुड़ना चाहिए, नई तकनीक अपनानी चाहिए, ज्यादा मूल्य वाली फसलें उगानी चाहिए और बाजार से सीधे जुड़ने की कोशिश करनी चाहिए.

आज सबसे सफल किसान सिर्फ उत्पादक नहीं, बल्कि ऑन्त्रप्रिन्योर यानी उद्यमी की तरह सोचते हैं. इस बदलाव में निजी क्षेत्र की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होगी

अगले दशक में किन ज्यादा मूल्य वाली फसलों में सबसे ज्यादा संभावनाएं हैं?

पॉपकॉर्न मक्का निश्चित रूप से ऐसी ही फसल है, क्योंकि इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और इसमें वैल्यू एडिशन की अच्छी संभावना है. इसके अलावा ऑयल पाम, फल, सब्जियां, मसाले, बीज उत्पादन, औषधीय पौधे और स्पेशेलिटी ग्रेन्स भी भविष्य की महत्वपूर्ण फसलें हैं.
आने वाला समय उन्हीं फसलों का होगा, जिनकी बाजार में मजबूत मांग हो और जिनमें प्रोसेसिंग व निर्यात की संभावना हो.

बदलते मौसम में पॉपकॉर्न मक्का कितनी टिकाऊ फसल है? किसानों को क्या अपनाना चाहिए?

हर फसल की तरह पॉपकॉर्न मक्का भी मौसम की मार से प्रभावित होती है. लेकिन सही खेती के तरीके अपनाकर जोखिम काफी कम किया जा सकता है. Gourmet Popcornica लगातार ऐसे बीज विकसित करने पर काम कर रही है, जो भारतीय मौसम के अनुसार ज्यादा अनुकूल हों.

इसके साथ ही मिट्टी में नमी बनाए रखना, प्रिसिजन सिंचाई, संतुलित पोषण, तकनीक के जरिए फसल की निगरानी और समय पर कीट प्रबंधन जैसी बातें किसानों को मौसम से जुड़े जोखिम कम करने में मदद करती हैं.

मशीनीकरण और डेटा के आधार पर खेती से जुड़े फैसले भी क्लाइमेट के उतार-चढ़ाव को मैनेज करने में अब पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.

कोई ऐसा किसान जिसकी कहानी आपको याद रह गई हो?

छत्तीसगढ़ के किसानों की एक कहानी हमेशा याद रहती है. शुरुआत में वहां के किसान पॉपकॉर्न मक्का को लेकर काफी संदेह में थे. लेकिन लगातार संवाद, प्रशिक्षण और फसल की सुनिश्चित खरीद के बाद उन्होंने धीरे-धीरे इस फसल को अपनाना शुरू किया.
आज उनमें से कई किसानों ने खेती का रकबा बढ़ाया है, खेती के लिए मशीनें खरीदी हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में अच्छा सुधार किया है. जब किसी नई फसल के जरिए पूरे गांव या समुदाय का आत्मविश्वास और जीवन स्तर बेहतर होता है, तो उससे बड़ी संतुष्टि नहीं हो सकती.
आज हमारे साथ जुड़े किसान या तो खुद Gourmet Popcornica के साथ काम करके सफल हुए हैं, या फिर ऐसे किसी किसान को जानते हैं जिसे हमारे साथ काम करके फायदा हुआ है.

सफल कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए कौन-कौन सी सुरक्षा जरूरी है?

तीन बातें सबसे जरूरी हैं. पहली, बुआई से पहले ही खरीद मूल्य पूरी तरह पारदर्शी तरीके से तय हो. दूसरी, कंपनी की खरीद की जिम्मेदारी कानूनी रूप से लागू हो सके. तीसरी, किसानों को समय पर भुगतान सीधे उनके बैंक खाते में मिले. इसके अलावा कंपनियों को पूरी फसल अवधि के दौरान किसानों को सही तकनीकी सहायता भी देनी चाहिए.

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग तभी सफल होती है, जब किसान और कंपनी दोनों जोखिम और लाभ को निष्पक्ष तरीके से साझा करें.

पिछले पांच साल में कौन-सी तकनीक सबसे ज्यादा प्रभावित करती है? अगले पांच साल में कौन-सी तकनीक सबसे बड़ा बदलाव लाएगी?

पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन आधारित खेती ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है .इससे काम तेजी से होता है, मजदूरों पर निर्भरता कम होती है और खाद व कीटनाशकों का अधिक सटीक इस्तेमाल संभव होता है.

अगले पांच साल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रिमोट सेंसिंग और प्रेडिक्टिव एनालिटिक्स सबसे बड़ा बदलाव लाएंगे. किसानों को उनकी जमीन, मौसम और फसल की स्थिति के अनुसार रियल टाइम सलाह मिल सकेगी.

कौन-सी ऐसी फसल है, जिसकी क्षमता को भारतीय किसान अभी कम आंक रहे हैं?

हमारे नजरिए से पॉपकॉर्न मक्का ऐसी ही फसल है. भारत में इसकी खपत लगातार बढ़ रही है. आयात की जगह देश में इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और भविष्य में निर्यात की भी अच्छी संभावना है.

यह ऐसी फसल है, जिसमें वैल्यू एडिशन भी है और व्यवस्थित बाजार भी.

 किसानों की सबसे आम गलती क्या होती है?

कई किसान सिर्फ पिछले सीजन की कीमत देखकर अगली फसल का फैसला करते हैं. अगर किसी फसल के दाम एक साल बहुत अच्छे मिलते हैं, तो अगले साल बड़ी संख्या में किसान वही फसल बो देते हैं. इससे उत्पादन बढ़ जाता है और कीमतें गिर जाती हैं.

इसलिए शॉर्ट टर्म मार्केट ट्रेंड के बजाय लॉन्ग टर्म योजना बनाना ज्यादा जरूरी है. सरकार और निजी क्षेत्र, दोनों को मिलकर किसानों को यह समझाने की जरूरत है कि फसल का चुनाव कैसे किया जाए और सही निर्णय कैसे लिया जाए.

खेती से जुड़ा ऐसा कौन-सा मिथक है, जिसे आप गलत साबित करना चाहते हैं?

सबसे बड़ा मिथक यह है कि बड़ा खेत होने का मतलब ज्यादा मुनाफा होना. असल में मुनाफा इस बात पर निर्भर करता है कि किसान कितना उत्पादन ले रहा है, कौन-सी फसल उगा रहा है, उसे बाजार कैसा मिल रहा है और वह खेती का प्रबंधन कितनी अच्छी तरह कर रहा है.
मैंने कई छोटे किसानों को बड़े किसानों से बेहतर प्रदर्शन करते देखा है, क्योंकि उन्होंने सिर्फ जमीन बढ़ाने के बजाय खेती की दक्षता और ज्यादा मूल्य पैदा करने पर ध्यान दिया. इस पर कम ध्यान दिया कि जमीन कितनी है.

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Published: 5 Jul, 2026 | 07:19 AM

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