केले की कीमतों में बड़ी गिरावट, 22–25 प्रति किलो पर सिमटे दाम… किसानों का लागत निकालना भी मुश्किल

जनवरी में केले का भाव करीब 25 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच गया था. किसानों को लगा था कि लंबे समय से चल रही मंदी के बाद अब उन्हें मेहनत का सही दाम मिलेगा. लेकिन फरवरी के अंत तक कीमतें गिरकर करीब 15 हजार रुपये प्रति टन पर आ गईं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 2 Mar, 2026 | 09:20 AM

Banana price crash 2026: आंध्र प्रदेश का रायलसीमा इलाका लंबे समय से केले की खेती के लिए जाना जाता है. यहां के खेतों में दूर-दूर तक फैले हरे-भरे बागान किसानों की मेहनत की कहानी कहते हैं. लेकिन इस बार अच्छी पैदावार के बावजूद किसानों के चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि चिंता साफ दिखाई दे रही है. वजह है केले के दामों में आई अचानक और तेज गिरावट, जिसने एक बार फिर हजारों बागवानों को आर्थिक संकट में धकेल दिया है.

डेक्कन क्रॉनिकल की खबर के अनुसार, कुछ ही हफ्तों पहले तक हालात उम्मीद जगाने वाले थे. जनवरी में केले का भाव करीब 25 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच गया था. किसानों को लगा था कि लंबे समय से चल रही मंदी के बाद अब उन्हें मेहनत का सही दाम मिलेगा. लेकिन फरवरी के अंत तक कीमतें गिरकर करीब 15 हजार रुपये प्रति टन पर आ गईं. यानी कुछ ही दिनों में लगभग 7 से 10 हजार रुपये प्रति टन की गिरावट ने पूरे गणित को बिगाड़ दिया.

खेतों में मेहनत, बाजार में मायूसी

रायलसीमा के कडप्पा, कुरनूल, नंदयाल और अनंतपुर जिलों में बड़े पैमाने पर ‘ग्रैंड 9’ यानी जी-9 किस्म का केला उगाया जाता है. यह किस्म बेहतर गुणवत्ता और ज्यादा उत्पादन के लिए जानी जाती है. एक एकड़ में औसतन 20 टन तक उत्पादन हो जाता है. लेकिन खेती की लागत भी कम नहीं है. किसानों का कहना है कि एक एकड़ में लगभग डेढ़ लाख रुपये तक खर्च आ जाता है, जिसमें पौध, खाद, सिंचाई, मजदूरी और कीटनाशक शामिल हैं.

किसानों के मुताबिक, यदि बाजार में भाव 22 हजार रुपये प्रति टन से ऊपर रहे तो ही उन्हें ठीक-ठाक लाभ मिल पाता है. लेकिन जब भाव 15 हजार रुपये तक गिर जाता है, तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है. राजमपेट क्षेत्र के एक किसान ने बताया कि अगर सीजन की पहली कटाई में ही दाम गिर जाएं तो पूरे साल की योजना गड़बड़ा जाती है. बाद की कटाई में कुछ संभलने की उम्मीद रहती है, लेकिन शुरुआत ही कमजोर हो तो नुकसान तय है.

बाजार में आधी रह गई कीमत

स्थानीय मंडियों में भी गिरावट साफ दिखाई दे रही है. जो केला पहले 40 से 45 रुपये प्रति किलो बिक रहा था, वह अब 22 से 25 रुपये प्रति किलो में ही बिक पा रहा है. खुदरा बाजार में भी इसका असर दिख रहा है. किसान कहते हैं कि उत्पादन अच्छा होने के बावजूद मांग कमजोर है, इसलिए व्यापारी कम भाव पर ही खरीद कर रहे हैं.

यह पहली बार नहीं है जब रायलसीमा के केला किसानों को ऐसे हालात का सामना करना पड़ रहा है. नवंबर 2025 में तो हालात और भी खराब हो गए थे, जब कीमतें 2 से 3 हजार रुपये प्रति टन तक गिर गई थीं. उस समय कई किसानों ने खेत में खड़ी फसल को ही छोड़ दिया था क्योंकि तुड़ाई और ढुलाई का खर्च भी नहीं निकल रहा था.

निर्यात में सुस्ती का असर

विशेषज्ञों और बागवानी विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस बार गिरावट की एक बड़ी वजह निर्यात में कमी है. खाड़ी देशों में भारतीय केले की अच्छी मांग रहती है, लेकिन हाल के अंतरराष्ट्रीय तनाव और बदलते व्यापारिक हालात के कारण निर्यात धीमा पड़ा है. जब निर्यात घटता है तो अतिरिक्त माल स्थानीय बाजार में आ जाता है, जिससे कीमतें नीचे चली जाती हैं.

इसके अलावा, जल्दी बढ़ती गर्मी और भंडारण की कमी भी समस्या को बढ़ा रही है. केला ऐसी फसल है जिसे लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जा सकता. किसान मजबूरी में कटाई के तुरंत बाद बिक्री करते हैं. कोल्ड स्टोरेज या प्रोसेसिंग की पर्याप्त सुविधा न होने से उन्हें बाजार के मौजूदा भाव पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

आधे राज्य की निर्भरता

आंध्र प्रदेश में लगभग एक लाख हेक्टेयर में केले की खेती होती है, जिसमें से करीब आधा हिस्सा रायलसीमा क्षेत्र में है. केवल कडप्पा जिले में ही 26 हजार हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में केला उगाया जाता है और सालाना उत्पादन लाखों टन में होता है. अनंतपुर और कुरनूल भी प्रमुख उत्पादक जिले हैं. इतने बड़े पैमाने पर खेती होने के कारण कीमतों में थोड़ा सा उतार-चढ़ाव भी हजारों परिवारों की आय पर असर डाल देता है.

समाधान की तलाश

किसानों का कहना है कि सरकार को निर्यात बढ़ाने, नए बाजार खोजने और प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर ध्यान देना चाहिए. यदि केले से चिप्स, पाउडर या अन्य उत्पाद बनाए जाएं तो अतिरिक्त उत्पादन का उपयोग हो सकता है. साथ ही, उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य या मूल्य स्थिरीकरण योजना जैसी व्यवस्था से किसानों को राहत मिल सकती है.

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Published: 2 Mar, 2026 | 09:20 AM

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