Turmeric Farming: जब भी महाराष्ट्र की बात होती है, तो लोगों के जहन में सबसे पहले अंगूर, संतरा और प्याज की तस्वीर उभरकर सामने आती है. लोगों को लगता है कि यहां पर किसान केवल अंगूर, संतरा और प्याज की ही खेती करते हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं है. महाराष्ट्र में हल्दी की भी बड़ी स्तर पर खेती की जाती है. वर्धा जिले में की जाने वाली वाइगांव हल्दी अपनी क्वालिटी के चलते पूरी दुनिया में मशहूर है. इसकी सप्लाई केवल देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी होती है. यही वजह है कि इसे जीआई टैग भी मिला हुआ है.
वाइगांव हल्दी में कर्क्यूमिन की मात्रा 6 फीसदी से ज्यादा होती है, जो इसे ज्यादा प्रभावी बनाती है. इसका रंग गहरा पीला (सरसों जैसा) और खुशबू बहुत तेज होती है. इसे इसकी खास गुणवत्ता और एक सीमित क्षेत्र में उगाए जाने के कारण GI टैग भी मिला हुआ है और यह पोषक तत्वों से भरपूर क्षारीय मिट्टी में उगाई जाती है. वाइगांव हल्दी अपनी खास गुणवत्ता के लिए जानी जाती है. यह हल्दी बैक्टीरिया और वायरस से लड़ने में मदद करती है और खांसी, जुकाम व जोड़ों के दर्द में भी फायदेमंद मानी जाती है.
गुणवत्ता के कारण इसे 2016 में GI टैग मिला
इसकी खेती वर्धा जिले की क्षारीय मिट्टी में की जाती है. इसकी खास पहचान और गुणवत्ता के कारण इसे 2016 में GI टैग भी दिया गया था. वाइगांव हल्दी का उपयोग कई तरह से किया जाता है. इसे खाने में स्वाद और रंग बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. स्वास्थ्य के लिए यह हल्दी दूध (हल्दी वाला दूध) बनाने में भी काम आती है. इसके अलावा, इसे पारंपरिक इलाज और त्वचा की देखभाल में भी उपयोग किया जाता है. अपनी बेहतरीन गुणवत्ता के कारण इसे भारत की सबसे अच्छी हल्दी किस्मों में से एक माना जाता है.
- सावधान! कहीं आपकी रसोई में भी मिलावट हल्दी तो नहीं? 2 मिनट का ये टेस्ट खोल देगा सारी सच्चाई, जानें
- ब्लैक थ्रिप्स से आम की फसल प्रभावित.. उत्पादन कम होने से कीमतों में बढ़ोतरी, 23000 रुपये क्विंटल रेट
- देश में 180 लाख टन से ज्यादा है खाद का स्टॉक, खरीफ सीजन में उर्वरक आपूर्ति को लेकर केंद्र ने बनाई रणनीति
- सरसों के उत्पादन में 3.64 फीसदी की बढ़ोतरी, राजस्थान पहले स्थान पर.. जानें MP, यूपी, हरियाणा का हाल
हल्दी में 6 फीसदी से ज्यादा कर्क्यूमिन होता है
वाइगांव हल्दी का इतिहास मुगल काल से जुड़ा हुआ है. कुछ सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इसकी खेती ‘माली’ समुदाय को सौंपी गई थी. यह खास हल्दी काली, क्षारीय मिट्टी में उगती है, जिसमें पानी रोकने की क्षमता और ऑर्गेनिक कार्बन अधिक होता है, जिससे यह पोषक तत्वों से भरपूर बनती है. इसमें 6 फीसदी से ज्यादा कर्क्यूमिन होता है, इसलिए इसे सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है और कुछ मामलों में कैंसर इलाज के दौरान सप्लीमेंट के रूप में भी उपयोग किया जाता है. इसके अलावा, यह गठिया (आर्थराइटिस), त्वचा रोग जैसे एक्जिमा के इलाज में भी काम आती है और घावों में संक्रमण से बचाने के लिए बाहरी एंटीबायोटिक की तरह भी इस्तेमाल की जाती है.
करीब 1,300 हेक्टेयर में होती है खेती
समुद्रपुर तालुका में वाइगांव हल्दी की खेती करीब 1,300 हेक्टेयर में होती है, जिससे लगभग 19,500 टन उत्पादन मिलता है. हालांकि, इनमें से सिर्फ 30 प्रतिशत खेती ही जैविक प्रमाणित है. कृषि अधिकारियों के अनुसार, अब कई किसान जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि इससे मिट्टी की सेहत बेहतर रहती है और रासायनिक खेती की तुलना में जैविक उत्पादों को बेहतर कीमत भी मिलती है.
8-9 महीने में फसल हो जाती है तैयार
वाइगांव हल्दी की खेती मुख्य रूप से जैविक तरीके से की जाती है और इसमें रासायनिक खादों का उपयोग नहीं होता. यह लगभग 8-9 महीने की फसल है, जिसकी बुवाई मई-जून के आसपास शुरू होती है. इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली काली या दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. खेत को अच्छी तरह जोतकर भुरभुरा बनाया जाता है और उसमें गोबर की खाद मिलाई जाती है. बुवाई आमतौर पर अक्षय तृतीया (अप्रैल- मई) के बाद या मॉनसून शुरू होने पर जून में की जाती है.
पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सेमी रखें
हल्दी के कंदों को कतारों में बोया जाता है, जिसमें पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30-45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेमी रखी जाती है. बुवाई के बाद कंदों को मिट्टी और सूखी पत्तियों से ढक दिया जाता है, ताकि नमी बनी रहे. इसमें पोषण के लिए जैविक खाद या कम्पोस्ट का उपयोग किया जाता है. पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद की जाती है और बाद में जरूरत के अनुसार लगभग हर 10-15 दिन में सिंचाई की जाती है.
खबर से जुड़े मुख्य आंकड़े
- समुद्रपुर तालुका में वाइगांव हल्दी की खेती करीब 1,300 हेक्टेयर में होती है
- इससे लगभग 19,500 टन उत्पादन मिलता है
- 8- 9 महीने में तैयार हो जाती है फसल
- मई-जून के आसपास की जाती है हल्दी की बुवाई
- खेती के लिए काली या दोमट मिट्टी अच्छी मानी गई है
- कंदों को पंक्तियों में बोया जाता है
- पंक्तियों की दूरी 30-45 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेमी रखी जाती है