हरियाणा में धान की खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है. हिसार स्थित चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) ने संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के बैंकॉक कार्यालय के साथ समझौता किया है. इस पहल का उद्देश्य किसानों के बीच डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक को बढ़ावा देना है, जिससे पानी और मजदूरी की बचत के साथ खेती की लागत कम हो सके.
इस समझौते के तहत HAU और FAO मिलकर किसानों को DSR तकनीक की जानकारी देंगे और इसके बेहतर इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षण व तकनीकी सहायता प्रदान करेंगे. इस तकनीक से खेती की लागत कम होगी, पानी की बचत होगी और किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि DSR तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाने से हरियाणा में धान की खेती अधिक टिकाऊ, किफायती और लाभदायक बन सकती है.
क्या बोले कुलपति प्रो. बीआर कंबोज
HAU के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से कहा कि यह सहयोग टिकाऊ धान उत्पादन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. उन्होंने बताया कि भूजल के घटते स्तर और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए DSR तकनीक पारंपरिक धान खेती का एक प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है. कुलपति के अनुसार, इस साझेदारी के तहत संयुक्त शोध, किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम, तकनीकी प्रदर्शन और ज्ञान के आदान-प्रदान जैसे कार्य किए जाएंगे, ताकि अधिक से अधिक किसान DSR तकनीक को अपनाएं.
बीजों का अंकुरण बेहतर होता है
उन्होंने कहा कि किसानों के बीच DSR तकनीक काफी लोकप्रिय है, क्योंकि इसमें कम पानी की जरूरत पड़ती है. साथ ही मजदूरी, उर्वरक और खेत की पडलिंग पर होने वाला खर्च भी कम हो जाता है, जिससे खेती की लागत घटती है और किसानों को अधिक लाभ मिलता है. HAU के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि इस सहयोग के तहत DSR खेती में किसानों को आने वाली चुनौतियों का समाधान नई तकनीकों की मदद से किया जाएगा. उन्होंने कहा कि जैविक बीज उपचार (बायोलॉजिकल सीड ट्रीटमेंट) तकनीक से बीजों का अंकुरण बेहतर होता है, पौधों की शुरुआती बढ़वार मजबूत होती है और रासायनिक उपचारों पर निर्भरता कम होती है. उन्होंने कहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी. यह पहल जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच कृषि को अधिक टिकाऊ और मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी.
मिट्टी की सेहत में सुधार होता है
परियोजना के नोडल अधिकारी एवं बेसिक साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज कॉलेज के डीन प्रो. राजेश गेरा ने कहा कि जैविक बीज उपचार से मिट्टी की सेहत में सुधार होता है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां बढ़ती हैं और फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है. इससे किसानों को बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ मिलने की संभावना है. प्रो. राजेश गेरा ने कहा कि यह तकनीक कृषि में रासायनिक इनपुट के उपयोग को कम करके पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी मदद करेगी. इससे मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव घटेगा तथा खेती अधिक टिकाऊ बनेगी.