कपास की खेती में 70 फीसदी गिरावट, 7 साल में कम होकर 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया रकबा

हरियाणा में कपास की खेती सात साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. राज्य में कपास का रकबा घटकर 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया है. कीटों के हमले, बेमौसम बारिश और जलभराव से लगातार नुकसान झेल रहे किसान अब धान और बाजरा जैसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है.

Kisan India
नोएडा | Published: 6 Jun, 2026 | 03:00 PM

cotton cultivation: हरियाणा में इस खरीफ सीजन के दौरान कपास की खेती में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. राज्य में कपास का रकबा 70 प्रतिशत घटकर 2.82 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले सात वर्षों का सबसे निचला स्तर है. विशेषज्ञों के अनुसार, कीटों के हमले, मौसम की मार और जलभराव से लगातार हो रहे नुकसान के कारण किसानों का कपास की खेती से मोहभंग हो रहा है. इसी वजह से बड़ी संख्या में किसान अब धान, बाजरा और अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. हरियाणा के सिरसा, हिसार और फतेहाबाद जिले, जिन्हें राज्य का प्रमुख कपास क्षेत्र माना जाता है और जहां कुल कपास क्षेत्र का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा आता है, वहां भी कपास की खेती में बहुत अधिक कमी देखी गई है. इससे राज्य के कपास उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है.

हरियाणा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में राज्य में कपास की खेती  का रकबा 50 प्रतिशत से अधिक घट गया है, जबकि पिछले सात वर्षों में इसमें करीब 70 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. मौजूदा सीजन में कपास का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 28 प्रतिशत कम रहा है. पिछले साल जहां करीब 3.9 लाख हेक्टेयर में कपास की खेती हुई थी, वहीं इस बार यह घटकर 2.82 लाख हेक्टेयर रह गई है.

कृषि वैज्ञानिकों की बढ़ी चिंता

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, कपास की खेती में लगातार आ रही इस गिरावट ने कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों की चिंता बढ़ा दी है. उनका मानना है कि कपास न केवल किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण नकदी फसल है, बल्कि यह धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों की तुलना में पर्यावरण के लिए भी बेहतर विकल्प है. हालांकि किसानों का कहना है कि उनके पास फसल बदलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है. सफेद मक्खी और अन्य कीटों के हमले, बेमौसम बारिश तथा जलभराव की समस्या के कारण उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है. यही वजह है कि कपास की खेती किसानों के लिए पहले की तुलना में कम लाभकारी और ज्यादा जोखिम भरी होती जा रही है.

पिछले साल 3.9 लाख हेक्टेयर में खेती

कृषि विभाग के अधिकारियों ने भी माना है कि कपास की खेती को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं. विभाग के अनुसार, वर्ष 2019-20 में हरियाणा में करीब 8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती होती थी, जो घटकर पिछले साल 3.9 लाख हेक्टेयर रह गई और इस साल और कम होकर 2.82 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है.

कृषि विभाग ने एक विशेष विंग बनाया

कपास की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कृषि विभाग ने एक विशेष विंग भी बनाया था, जिसने सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी, रेवाड़ी और महेंद्रगढ़ जैसे प्रमुख कपास उत्पादक जिलों पर विशेष ध्यान दिया. इसके अलावा किसानों को सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) के लिए 2,000 रुपये प्रति एकड़ और देसी कपास की खेती के लिए 4,000 रुपये प्रति एकड़ तक की प्रोत्साहन राशि भी दी गई. इसके बावजूद किसान कपास की खेती की ओर वापस नहीं लौटे और कपास का रकबा लगातार घटता रहा. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कपास की खेती में आई गिरावट की सबसे बड़ी वजह किसानों को लगातार हो रहा नुकसान है.

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