मॉनसूनी बारिश में देरी की वजह से इस बार कपास की बुवाई में 23 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. हालांकि, अब जब पूरे देश में मॉनसून सक्रिय हो गया है तो उम्मीद जताई गई है कि रकबे की गिरावट की भरपाई कर ली जाएगी. लेकिन, किसानों को हर हाल में 30 जुलाई तक कपास की बुवाई करना, किसी चुनौती से कम नहीं है. इसके बाद बुवाई करने से उत्पादन गिरेगा और मौसम बदलावों के चलते फसल की ग्रोथ रुकने का खतरा बना रहेगा.
23 फीसदी अंतर को पाट लेंगे किसान
देश में जुलाई के दौरान कपास की बुवाई महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के मजबूत होने के साथ तेज हो गई है. पहले यह बुवाई खरीफ सीजन में पिछले साल के मुकाबले 23 फीसदी कपास की बुवाई पीछे चल रही थी. कृषि आयुक्त पीके सिंह ने पीटीआई से कहा कि 5 जुलाई तक कपास का रकबा 63.18 लाख हेक्टेयर था, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 82 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी.
अल नीनो के चलते रुकी बुवाई में तेजी
कृषि आयुक्त ने कहा कि बीते तीन दिनों में बारिश में सुधार देखा गया है और इसके साथ कपास की बुवाई में तेजी देखी गई, जिससे रकबे का अंतर कम हुआ है. उन्होंने कहा कि मानसून में सुधार हुआ है. जुलाई में अच्छी बारिश हो रही है और बुवाई में तेजी आई है. अल नीनो के खतरे की वजह से कई इलाकों में किसान कपास की बुवाई से झिझक रहे हैं, लेकिन अब तेज बारिश से उन्होंने बुवाई शुरू की है.
बुवाई का समय 30 जुलाई तक बढ़ा
कृषि एक्सपर्ट ने कहा कि भारत में कपास की बुवाई साल में दो बार होती है और बुवाई का समय क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होता है. बुवाई आमतौर पर पंजाब और हरियाणा में शुरू होती है और फिर तमिलनाडु तक फैलती है. बुवाई का समय आमतौर पर 15 जुलाई तक खत्म हो जाता है, लेकिन इस सत्र में मानसून में देरी के कारण इसे 30 जुलाई तक बढ़ा दिया गया है.
कई राज्यों में कपास बुवाई कर रहे किसान
भारत के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में मध्य क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश शामिल हैं. इसके बाद उत्तरी राज्यों में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान आते हैं और दक्षिणी क्षेत्र में तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं. पिछली बार हरियाणा के फतेहाबाद, सिरसा समेत कई जिलों में सिंचाई संकट और कम बारिश के चलते किसानों ने बुवाई नहीं की थी. लेकिन, इस बार बुवाई देखी जा रही है.