अब AI बताएगा कहां उग रही असली बासमती! सरकार की नई तैयारी ने बढ़ाई हलचल

अगर यह सर्वे सही तरीके से लागू हुआ, तो किसानों को बड़ा फायदा मिल सकता है. इससे उन्हें फसल की सही जानकारी, बेहतर सलाह और निर्यात बाजार की मांग के हिसाब से खेती करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायता मिल सकती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 7 May, 2026 | 09:46 AM

भारत के बासमती चावल उद्योग में अब तकनीक की एंट्री तेजी से बढ़ रही है. सरकार ने पहली बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की मदद से बड़े स्तर पर बासमती धान का सर्वे कराने की तैयारी शुरू कर दी है. इस कदम को बासमती उत्पादन, निर्यात और खेती की सही जानकारी जुटाने के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है.

केंद्र सरकार की एजेंसी APEDA अब 2026 से 2028 के बीच लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में AI आधारित बासमती सर्वे कराएगी. इस योजना की घोषणा हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने की.

पहली बार AI तकनीक से होगा बासमती सर्वे

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सरकार का कहना है कि यह भारत का पहला AI आधारित बासमती धान सर्वे होगा. इसका उद्देश्य बासमती उत्पादन का सटीक आंकड़ा जुटाना, अलग-अलग किस्मों की पहचान करना और किसानों को वैज्ञानिक सलाह देना है. इसके जरिए निर्यात की बेहतर योजना बनाने में भी मदद मिलेगी.

40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होगा सर्वे

सरकारी जानकारी के मुताबिक यह सर्वे लगभग 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करेगा. साथ ही 1.5 लाख से ज्यादा ग्राउंड ट्रुथ पॉइंट्स से डेटा जुटाया जाएगा. इस पूरी प्रक्रिया में 5 लाख से ज्यादा किसानों को भी शामिल किया जाएगा.

पुराने आंकड़ों से उठे सवाल

इस योजना को लेकर उद्योग जगत में चर्चा और सवाल दोनों शुरू हो गए हैं. दरअसल APEDA की 2023 की रिपोर्ट में बासमती खेती का कुल क्षेत्रफल केवल 21.4 लाख हेक्टेयर बताया गया था. लेकिन अब नया सर्वे लगभग 40 लाख हेक्टेयर में कराया जा रहा है, जो पहले के आंकड़ों से लगभग दोगुना है. यही वजह है कि विशेषज्ञ और कारोबारी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर सर्वे का दायरा इतना बड़ा क्यों रखा गया है.

क्या बढ़ेगा बासमती GI क्षेत्र?

नए सर्वे के बाद बासमती GI यानी भौगोलिक संकेतक क्षेत्र को बढ़ाने की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं. फिलहाल पारंपरिक बासमती क्षेत्र कुछ चुनिंदा राज्यों तक सीमित माना जाता है. लेकिन अब ऐसा माना जा रहा है कि सरकार सुगंधित धान उत्पादन वाले दूसरे इलाकों की भी मैपिंग करना चाहती है.

मध्य प्रदेश को लेकर विवाद जारी

बासमती GI क्षेत्र में मध्य प्रदेश को शामिल करने का मामला अभी अदालत में लंबित है. इसके बावजूद बड़े स्तर पर सर्वे की योजना ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं. कई लोगों का मानना है कि सरकार भविष्य में बासमती क्षेत्र के दायरे को बढ़ाने की तैयारी कर रही है.

कैसे जुटाया जाता है फंड?

इस परियोजना को बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (BEDF) के फंड से चलाया जाएगा. इसके लिए APEDA निर्यातकों से हर टन पर 70 रुपये का शुल्क लेती है. यह शुल्क कॉन्ट्रैक्ट रजिस्ट्रेशन के दौरान अनिवार्य रूप से लिया जाता है.

उद्योग संगठन पर भी उठे सवाल

इस परियोजना में एक खास उद्योग संगठन के सहयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. कुछ उद्योग सूत्रों का कहना है कि उस संगठन का एक प्रतिनिधि BEDF बोर्ड का सदस्य भी है. इसी वजह से पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.

2024 में बंद हो गया था सर्वे

उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार APEDA हर साल बासमती सर्वे कराती थी. हालांकि कोरोना महामारी के दौरान यह प्रक्रिया प्रभावित हुई थी. इसके बाद 2024 में कुछ निर्यातकों के दबाव के चलते सर्वे बंद कर दिया गया था.

गैर-GI क्षेत्रों को शामिल करने पर विवाद

सूत्रों के मुताबिक सर्वे करने वाली एजेंसी से गैर-GI क्षेत्रों को भी शामिल करने के लिए कहा गया था. लेकिन एजेंसी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उसका कहना था कि कानूनी तौर पर गैर-GI क्षेत्र की फसल को बासमती नहीं कहा जा सकता.

निर्यात नीति के लिए जरूरी बताया सर्वे

IREF के अनुसार, वह इस परियोजना में सहयोग करना चाहता है. IREF के महानिदेशक बिनोद कौल ने कहा कि मजबूत और सटीक फसल सर्वे नीति निर्माण के लिए बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि सही उत्पादन आंकड़े तभी सामने आएंगे जब सर्वे व्यापक स्तर पर किया जाएगा.

किसानों को क्या होगा फायदा?

अगर यह सर्वे सही तरीके से लागू हुआ, तो किसानों को बड़ा फायदा मिल सकता है. इससे उन्हें फसल की सही जानकारी, बेहतर सलाह और निर्यात बाजार की मांग के हिसाब से खेती करने में मदद मिलेगी. इसके अलावा उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायता मिल सकती है.

निर्यात बढ़ाने में मिलेगी मदद

भारत दुनिया के सबसे बड़े बासमती निर्यातकों में शामिल है. ऐसे में सही उत्पादन डेटा और वैज्ञानिक सर्वे से निर्यात की बेहतर योजना बनाई जा सकेगी. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती की स्थिति और मजबूत हो सकती है.

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