खरीफ सीजन से पहले सरकार अलर्ट… उर्वरक आयात के लिए रूस, बेलारूस और मोरक्को से बढ़ाई बातचीत
कुछ समय पहले तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 425 डॉलर प्रति टन से नीचे थी, लेकिन अब यह बढ़कर 600 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गई है. इससे साफ है कि सप्लाई कम होने के साथ कीमतों में तेजी आई है. अगर यही स्थिति बनी रहती है, तो इसका असर भारत में उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों दोनों पर पड़ सकता है.
भारत में खेती देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है और इसी वजह से किसानों को समय पर खाद (उर्वरक) मिलना बेहद जरूरी होता है. लेकिन हाल ही में वैश्विक हालात, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और चीन की निर्यात नीतियों में बदलाव ने उर्वरकों की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इसी स्थिति को देखते हुए भारत सरकार अब पहले से ज्यादा सक्रिय हो गई है और नए विकल्प तलाशने में जुटी है.
रूस, बेलारूस और मोरक्को से बढ़ाई जा रही बातचीत
बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर के अनुसार, भारत रूस, बेलारूस और मोरक्को जैसे देशों से उर्वरकों की खरीद बढ़ाने के लिए बातचीत कर रहा है. सरकार और उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहा, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है. ऐसे में भारत पहले से ही तैयारी कर रहा है ताकि किसानों को किसी तरह की कमी का सामना न करना पड़े.
भारत फिलहाल यूरिया, DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) और पोटाश जैसे उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. यही कारण है कि सप्लाई में थोड़ी सी भी कमी सीधे खेती और उत्पादन पर असर डाल सकती है.
मिडिल ईस्ट पर ज्यादा निर्भरता बनी चिंता
अब तक भारत अपनी जरूरत का करीब आधा उर्वरक पश्चिम एशिया से मंगाता रहा है. सऊदी अरब भारत को सबसे ज्यादा DAP सप्लाई करता है, जबकि ओमान यूरिया का सबसे बड़ा सप्लायर है. लेकिन मौजूदा हालात में इस क्षेत्र से सप्लाई प्रभावित होने का खतरा बढ़ गया है. इसी वजह से भारत अब अपने आयात स्रोतों को विविध बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके और जोखिम घटाया जा सके.
एथेनॉल और गैस संकट का भी असर
यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस बेहद जरूरी होती है. लेकिन हाल के घटनाक्रम में कतर से आने वाली LNG सप्लाई भी प्रभावित हुई है. कतर भारत का सबसे बड़ा LNG सप्लायर है, लेकिन ईरान की ओर से होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर खतरे की चेतावनी के बाद आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है. इसका सीधा असर यूरिया उत्पादन पर पड़ सकता है, क्योंकि गैस की कमी होने पर उत्पादन घट सकता है और कीमतें बढ़ सकती हैं.
कीमतों में तेज उछाल, बढ़ी चिंता
कुछ समय पहले तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत 425 डॉलर प्रति टन से नीचे थी, लेकिन अब यह बढ़कर 600 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच गई है. इससे साफ है कि सप्लाई कम होने के साथ कीमतों में तेजी आई है. अगर यही स्थिति बनी रहती है, तो इसका असर भारत में उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतों दोनों पर पड़ सकता है, जिसका सीधा असर किसानों की लागत पर होगा.
खरीफ सीजन से पहले बढ़ती मांग
भारत में जून-जुलाई के दौरान खरीफ फसलों की बुवाई शुरू होती है. इस समय धान, मक्का, कपास और तिलहन जैसी फसलों के लिए उर्वरकों की मांग काफी बढ़ जाती है. आमतौर पर मार्च से मई के बीच उर्वरकों की बड़ी खेप भारत पहुंचती है ताकि सीजन के दौरान कोई कमी न हो. सरकार इस बार किसी भी तरह की कमी से बचना चाहती है, इसलिए पहले से ही आयात बढ़ाने और नए देशों से समझौते करने की दिशा में काम किया जा रहा है.
इंडोनेशिया भी बना विकल्प
भारत इंडोनेशिया से भी उर्वरक सप्लाई को लेकर बातचीत कर सकता है. हालांकि वहां से सप्लाई सीमित होती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर यह एक बैकअप विकल्प साबित हो सकता है.
किसानों के लिए क्या मायने?
इन सभी प्रयासों का सबसे बड़ा फायदा किसानों को मिलने की उम्मीद है. सरकार चाहती है कि खेती के सीजन में उर्वरकों की कोई कमी न हो और किसानों को समय पर उचित कीमत पर खाद मिलती रहे. अगर यह रणनीति सफल रहती है, तो किसानों को महंगे उर्वरकों और सप्लाई की कमी जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है. साथ ही देश में कृषि उत्पादन भी प्रभावित होने से बच जाएगा.
सरकार की प्राथमिकता: कोई कमी न हो
फिलहाल देश में उर्वरकों की कोई बड़ी कमी नहीं है, लेकिन सरकार पहले से ही सतर्क है. अधिकारियों का कहना है कि वे हर संभव कदम उठा रहे हैं ताकि आने वाले महीनों में सप्लाई पूरी तरह बनी रहे.