Kathiawadi Horse: रेत भरी जमीन, तेज धूप और दूर तक फैला सूखा इलाका-से माहौल में अगर कोई जानवर मजबूती से खड़ा रहता है तो वह है कठियावाड़ी घोड़ा. यह भारत की प्रमुख स्वदेशी घोड़ा नस्लों में गिना जाता है. अपनी तेज चाल, मजबूत शरीर और खास पहचान की वजह से यह घोड़ा आज भी लोगों का ध्यान खींचता है. बदलते समय में जहां विदेशी नस्लों का चलन बढ़ा है, वहीं यह देसी नस्ल अपनी अलग पहचान बनाए हुए है.
काठियावाड़ की धरती से जुड़ा इतिहास
इस घोड़े का उद्गम गुजरात के काठियावाड़ यानी सौराष्ट्र क्षेत्र में माना जाता है. पुराने समय में इसे युद्ध और लंबी दूरी की सवारी के लिए तैयार किया गया था. कहा जाता है कि यह घोड़ा अपने मालिक के प्रति बेहद वफादार होता है और कठिन हालात में भी साथ नहीं छोड़ता. गर्मी, सूखा और कम संसाधन-इन सब परिस्थितियों में भी यह आसानी से ढल जाता है. इसी वजह से पुराने समय में राजा-महाराजाओं और योद्धाओं की पहली पसंद माना जाता था. आज भी ग्रामीण इलाकों में इसकी शान और रौब देखने लायक होता है.
कानों से होती है पहचान
कठियावाड़ी घोड़े की सबसे बड़ी पहचान उसके कान हैं. इसके कान अंदर की ओर मुड़े हुए होते हैं और कई बार उनके सिरे आपस में छू जाते हैं. यही खासियत इसे दूसरी नस्लों से अलग बनाती है. इसका शरीर मजबूत, चाल तेज और सहनशक्ति बेहतरीन होती है. यह घोड़ा कम पानी और सीमित चारे में भी अपना संतुलन बनाए रख सकता है. यही वजह है कि शुष्क और गर्म इलाकों में भी इसका पालन संभव है. इसके रंग भी अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इसकी चाल और कान देखकर लोग तुरंत पहचान लेते हैं कि यह कठियावाड़ी नस्ल है.
कम संसाधन में ज्यादा सहनशक्ति
आज के समय में जहां पशुपालन में खर्च बढ़ता जा रहा है, वहां यह नस्ल कम लागत में भी पाली जा सकती है. इसे ज्यादा खास देखभाल की जरूरत नहीं होती. गर्म मौसम में भी यह आसानी से काम कर सकता है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुछ लोग इस नस्ल का पालन सवारी, पारंपरिक कार्यक्रमों और शौक के लिए करते हैं. कुछ जगहों पर घुड़सवारी प्रतियोगिताओं में भी यह नस्ल हिस्सा लेती है. इसकी फुर्ती और संतुलन इसे खास बनाते हैं.
स्वदेशी नस्लों का संरक्षण क्यों जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वदेशी पशु नस्लों को बचाना बहुत जरूरी है. ये नस्लें हमारे देश की जलवायु के अनुसार खुद को ढाल चुकी हैं. अगर इनका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले समय में ये धीरे-धीरे कम हो सकती हैं. कठियावाड़ी घोड़ा सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी इसका योगदान रहा है. मेलों, शो और पारंपरिक आयोजनों में यह आज भी आकर्षण का केंद्र बनता है.
यह घोड़ा ताकत, सहनशीलता और शान का प्रतीक है. बदलते दौर में जरूरत है कि लोग स्वदेशी नस्लों की अहमियत समझें और इनके संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाएं. कठियावाड़ी घोड़ा आज भी यह साबित करता है कि देसी नस्लें किसी से कम नहीं होतीं. सही देखभाल और जागरूकता के साथ यह नस्ल आने वाली पीढ़ियों तक अपनी पहचान बनाए रख सकती है.