खरपतवार खत्म करने वाली इस दवा पर सरकार सख्त, पूरे देश में जल्द लग सकता है बैन

पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक ऐसी दवा है जिसका इस्तेमाल खेतों में उगने वाली बेकार घास और खरपतवार को खत्म करने के लिए किया जाता है. किसान इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसका असर बहुत जल्दी दिखाई देता है और यह दूसरी कई दवाओं के मुकाबले सस्ती भी पड़ती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 7 May, 2026 | 06:00 PM

Paraquat ban: देश में खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली एक मशहूर खरपतवारनाशक दवा अब बड़े विवाद में आ गई है. केंद्र सरकार जल्द ही पैराक्वाट डाइक्लोराइड नाम की इस दवा पर पूरे देश में प्रतिबंध लगा सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह रसायन इंसानों की सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है.

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की एक समिति ने सरकार को रिपोर्ट सौंपकर इस दवा पर पूरी तरह रोक लगाने की सिफारिश की है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस रसायन के संपर्क में आने से गंभीर बीमारी, किडनी खराब होने, फेफड़ों में दिक्कत और यहां तक कि मौत का खतरा भी बढ़ सकता है. अगर सरकार इस पर बैन लगाती है, तो इसका असर लाखों किसानों, कृषि दवा कंपनियों और खेती के तरीकों पर पड़ सकता है.

आखिर क्या है यह दवा?

पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक ऐसी दवा है जिसका इस्तेमाल खेतों में उगने वाली बेकार घास और खरपतवार को खत्म करने के लिए किया जाता है. किसान इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसका असर बहुत जल्दी दिखाई देता है और यह दूसरी कई दवाओं के मुकाबले सस्ती भी पड़ती है.

देश में चाय, कॉफी, रबर, कपास, धान, गेहूं, मक्का, आलू, अंगूर और सेब जैसी फसलों में इसका बड़े पैमाने पर उपयोग होता है. कई जगह नहरों और तालाबों के आसपास उगी घास हटाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

डॉक्टरों ने क्यों जताई चिंता?

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, विशेषज्ञों के मुताबिक यह दवा शरीर में कई तरीकों से नुकसान पहुंचा सकती है. अगर कोई व्यक्ति गलती से इसे निगल ले, इसकी तेज गंध या धुएं को सांस के जरिए अंदर ले ले या यह त्वचा पर ज्यादा मात्रा में लग जाए, तो हालत गंभीर हो सकती है.

एक मेडिकल अध्ययन में बताया गया कि यह रसायन किडनी फेल होने, फेफड़ों में स्थायी नुकसान और पार्किंसन जैसी बीमारी का कारण बन सकता है. कई मामलों में इससे मौत तक हो चुकी है.

विशाखापट्टनम के आंध्र मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारत में पैराक्वाट के कारण जानबूझकर और दुर्घटनावश होने वाले जहर के मामलों की संख्या काफी ज्यादा है.

तेलंगाना और ओडिशा पहले ही उठा चुके हैं कदम

इस दवा को लेकर कुछ राज्य पहले से सख्त कदम उठा चुके हैं. तेलंगाना सरकार ने हाल ही में 60 दिनों के लिए इसकी बिक्री और इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. राज्य सरकार ने केंद्र से पूरे देश में इसे स्थायी रूप से बंद करने की मांग भी की.

ओडिशा सरकार भी पहले ऐसा कदम उठा चुकी है. वहीं केरल में भी इसे रोकने की कोशिश हुई थी, लेकिन कानूनी कारणों से मामला आगे नहीं बढ़ पाया. अब केंद्र सरकार पूरे देश के लिए एक बड़ा फैसला लेने की तैयारी कर रही है.

खेती पर क्या पड़ेगा असर?

इस दवा पर बैन लगने की चर्चा के बाद किसानों के बीच चिंता बढ़ गई है. कई किसान मानते हैं कि इससे खेती की लागत बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि पैराक्वाट की जगह इस्तेमाल होने वाली दूसरी दवाएं कई बार 2 से 10 गुना तक महंगी पड़ती हैं. वहीं अगर बिना रसायन वाले तरीकों से खरपतवार हटाया जाए, तो खर्च और ज्यादा बढ़ सकता है. खासतौर पर उन इलाकों में जहां मजदूरों की कमी है, वहां किसानों के लिए परेशानी और बढ़ सकती है.

लगातार बढ़ रहा था इस्तेमाल

स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के बावजूद पिछले कुछ सालों में इस दवा का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. जानकारी के अनुसार 2019-20 में इसका आयात करीब 8,598 टन था, जो 2022-23 में बढ़कर 20,786 टन तक पहुंच गया. घरेलू बाजार में इसकी बिक्री भी फिर से बढ़ने लगी थी. इससे साफ है कि खेती में इस दवा की निर्भरता काफी ज्यादा हो चुकी है.

पहले सरकार ने दी थी अनुमति

कुछ साल पहले सरकार ने इस दवा के इस्तेमाल को कुछ शर्तों के साथ जारी रखने की मंजूरी दी थी. साल 2015 में कृषि मंत्रालय की समिति ने बेहतर पैकिंग, चेतावनी वाले लेबल और डॉक्टरों को विशेष प्रशिक्षण देने जैसी शर्तें रखी थीं. लेकिन लगातार सामने आ रहे स्वास्थ्य मामलों के बाद इसकी सुरक्षा पर दोबारा सवाल उठने लगे. इसके बाद सरकार ने नई विशेषज्ञ समिति बनाकर पूरे मामले की फिर से जांच कराई.

स्वास्थ्य और खेती के बीच संतुलन की चुनौती

अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों की जरूरत और लोगों की सेहत दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. डॉक्टर और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे बेहद खतरनाक बता रहे हैं, जबकि किसान कह रहे हैं कि अगर इसे अचानक बंद किया गया तो खेती की लागत बढ़ जाएगी.

रिपोर्ट के अनुसार, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार इस दवा पर प्रतिबंध लगाती है, तो किसानों को सुरक्षित और सस्ते विकल्प भी देने होंगे. साथ ही नई तकनीक और वैकल्पिक तरीकों पर भी तेजी से काम करना पड़ेगा.

क्या हो सकता है आगे?

अब सबकी नजर केंद्र सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है. अगर देशभर में इस दवा पर प्रतिबंध लागू होता है, तो यह भारत के कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. एक तरफ इससे लोगों की सेहत को राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को नई व्यवस्था के हिसाब से खुद को ढालना पड़ेगा. आने वाले दिनों में सरकार का फैसला खेती और कृषि बाजार दोनों पर बड़ा असर डाल सकता है.

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