जूट के रेट में 50 फीसदी की गिरावट, तीन हफ्ते में 9000 रुपये क्विंटल सस्ता हुआ भाव.. टेंशन में किसान
पश्चिम बंगाल में कच्चे जूट की कीमतें तीन सप्ताह में करीब 50 फीसदी गिर गई हैं. इस गिरावट के बाद सरकारी जूट पैकेजिंग की कीमत तय करने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं. IJMA ने JBA की दैनिक कीमतों पर आपत्ति जताई है, जबकि JBA का कहना है कि उसकी मूल्य निर्धारण प्रणाली निष्पक्ष और वर्षों से लागू है.
Jute Price Fall: पश्चिम बंगाल में कच्चे जूट (रॉ जूट) की कीमतों में पिछले तीन हफ्तों के दौरान करीब 50 फीसदी की बड़ी गिरावट आई है. इससे सरकारी जूट पैकेजिंग सामग्री की कीमत तय करने की व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं. वहीं, जूट उद्योग ने भी हर दिन जारी होने वाली बाजार कीमतों (डेली मार्केट कोटेशन) तय करने के तरीके पर आपत्ति जताई है. जूट बेलर्स एसोसिएशन (JBA) के अनुसार, दक्षिण बंगाल के TD-5 ग्रेड कच्चे जूट का बेंचमार्क भाव 9 जुलाई को 18,300 रुपये प्रति क्विंटल था, जो 1 अगस्त तक घटकर 9,100 रुपये प्रति क्विंटल रह गया. यानी महज तीन सप्ताह में कीमत में 9,000 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक, लगभग 50 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.
न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, जूट उद्योग से जुड़े अनुभवी कारोबारी और इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (IJMA) के पूर्व चेयरमैन संजय काजरिया ने कहा कि कच्चे जूट की कीमतों में आई यह भारी गिरावट बेहद असामान्य है. उनका कहना है कि इससे किसानों, जूट मिलों और सरकार की जूट पैकेजिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. उन्होंने मांग की कि वास्तविक खरीद-बिक्री (ट्रांजैक्शन) के आधार पर जांच होनी चाहिए कि आखिर कीमतें इतनी तेजी से कैसे गिर गईं, जबकि नई फसल की पर्याप्त आवक भी अभी बाजार में नहीं हुई है.
तय मात्रा में जूट की आपूर्ति भी नहीं हो रही
वहीं, इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (IJMA) ने 14 जुलाई को जूट बेलर्स एसोसिएशन (JBA) के चेयरमैन मदन गोपाल माहेश्वरी को लिखे पत्र में आरोप लगाया कि JBA की ओर से जारी की जाने वाली दैनिक कीमतें बाजार के वास्तविक कारोबार को नहीं दर्शाती हैं. एसोसिएशन का कहना है कि जूट मिलों को तैयार माल की तत्काल डिलीवरी के लिए JBA के प्रकाशित भाव से कहीं अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है, इसके बावजूद कई बार तय मात्रा में जूट की आपूर्ति भी नहीं हो रही है.
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क्या कहता है जूट बेलर्स एसोसिएशन
इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन (IJMA) का कहना है कि जूट बेलर्स एसोसिएशन (JBA) की ओर से जारी दैनिक कीमतों का इस्तेमाल जूट आयुक्त (Jute Commissioner) का कार्यालय सरकारी जूट के बोरों (गन्नी बैग) की मासिक उचित कीमत तय करने के लिए करता है. कच्चे जूट की लागत कुल उत्पादन लागत का करीब दो-तिहाई हिस्सा होती है. ऐसे में यदि दैनिक कीमतें वास्तविक बाजार भाव को नहीं दर्शातीं, तो इससे सरकारी मूल्य निर्धारण प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते हैं.
कीमत तय करने के तरीके पर JBA की सफाई
वहीं, JBA के चेयरमैन मदन गोपाल माहेश्वरी ने 16 जुलाई को दिए जवाब में कहा कि एसोसिएशन की पांच सदस्यीय समिति हर कार्यदिवस पर भाग लेने वाली जूट मिलों से प्राप्त कीमतों को दर्ज करती है. इसके बाद 7 से 10 दिन की तय डिलीवरी अवधि के आधार पर समान शर्तों पर उनकी तुलना कर बेंचमार्क कीमत तय की जाती है. उन्होंने यह भी कहा कि अलग डिलीवरी अवधि या अलग भुगतान शर्तों वाले सौदों को इस बेंचमार्क में शामिल नहीं किया जाता. JBA के चेयरमैन मदन गोपाल माहेश्वरी ने कहा कि एसोसिएशन की ओर से जारी दैनिक कीमतों का उद्देश्य बाजार में तैयार डिलीवरी वाले सौदों की निष्पक्ष, पारदर्शी और एक समान जानकारी देना है. उन्होंने कहा कि कीमत तय करने की यही प्रक्रिया कई वर्षों से लगातार अपनाई जा रही है और इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है.