Lemon Farming: आज के समय में खेती में वही किसान आगे बढ़ रहा है, जो बाजार की जरूरत के हिसाब से फसल चुन रहा है. पारंपरिक गेहूं-धान से हटकर अगर कोई ऐसी फसल उगाई जाए, जिसमें खर्च कम हो और कमाई सालभर बनी रहे, तो बारहमासी कागजी नींबू किसानों के लिए एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है. नींबू की मांग हर घर की रसोई से लेकर होटल, ढाबे, जूस सेंटर और दवा कंपनियों तक बनी रहती है.
क्या है बारहमासी कागजी नींबू की खासियत?
साधारण नींबू जहां साल में एक-दो बार फल देता है, वहीं बारहमासी कागजी नींबू पूरे साल फूल और फल देता रहता है. इसका छिलका काफी पतला होता है और रस भरपूर निकलता है, इसी वजह से बाजार में इसकी डिमांड ज्यादा रहती है. खास बात यह है कि एक बार लगाया गया पौधा 25 से 30 साल तक लगातार फल देता है.
किस जलवायु और मिट्टी में होगी अच्छी पैदावार?
नींबू की खेती भारत के लगभग हर राज्य में की जा सकती है. इसके लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है, बस ध्यान रहे कि खेत में पानी जमा न हो. यह फसल गर्मी और तेज धूप को आसानी से सहन कर लेती है, इसलिए यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे इलाकों में भी इसकी पैदावार बढ़िया होती है.
खेत की तैयारी और रोपाई कैसे करें?
खेत को अच्छी तरह जोतने के बाद 15-15 फीट की दूरी पर छोटे-छोटे गड्ढे बनाएं, हर गड्ढे का साइज लगभग 2*2*2 फीट हो. इन गड्ढों को कुछ दिन खुला छोड़ दें, फिर इसमें गोबर की खाद, नीम की खली और थोड़ी मिट्टी मिलाकर तैयार करें. पौधे लगाने का सही समय जुलाई से सितंबर के बीच होता है.
सही पौधे और देखरेख जरूरी
हमेशा सरकारी नर्सरी या भरोसेमंद जगह से कलमी (ग्राफ्टेड) पौधे ही लें. ऐसे पौधों में 2 साल के भीतर फल आना शुरू हो जाता है. सिंचाई ज्यादा नहीं करनी होती-गर्मियों में 10-15 दिन और सर्दियों में महीने में एक बार पानी काफी है. ड्रिप सिंचाई सबसे बेहतर मानी जाती है.
कमाई का पूरा हिसाब
एक एकड़ में करीब 300-400 पौधे लगाए जा सकते हैं. शुरुआती खर्च लगभग 50 से 70 हजार रुपये आता है. तीसरे साल से एक पौधा 20-30 किलो नींबू देने लगता है, जो आगे चलकर 80-100 किलो तक पहुंच सकता है. अगर औसतन 10 हजार किलो नींबू भी निकले और भाव 40-50 रुपये किलो मिले, तो सालाना 4-5 लाख रुपये की कमाई संभव है. गर्मियों में दाम बढ़ने पर मुनाफा और भी ज्यादा हो सकता है.
नींबू को स्थानीय मंडी, होटल, जूस फैक्ट्री या अचार बनाने वाली कंपनियों को बेचा जा सकता है. अच्छी ग्रेडिंग और पैकिंग से किसानों को और बेहतर दाम मिलते हैं.