गलत फसल बोई तो मेहनत बेकार! बुवाई से पहले करें मिट्टी की सही पहचान, नहीं तो पैदावार और कमाई दोनों हो जाएगी आधी

Tips For Farmers: किसान अगर बिना सोचे-समझे फसल बो देगा तो मेहनत के बाद भी नुकसान हो सकता है. हर जमीन की मिट्टी अलग होती है और उसी हिसाब से फसल चुनना जरूरी है. अब सॉयल हेल्थ कार्ड से मिट्टी की जांच आसान हो गई है, जिससे पता चल जाता है कि कौन-सी फसल लगानी चाहिए. सही फसल बोएंगे तो खर्च भी कम होगा और पैदावार भी ज्यादा मिलेगी.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 23 Jan, 2026 | 06:00 AM

Soil Health Card: भारत को हमेशा से ही कृषि प्रधान देश कहा जाता है, क्योंकि यहां ज्यादातर लोग अपनी रोजी-रोटी खेती-बाड़ी से कमाते हैं. लेकिन अब समय बदल गया है और किसानों के सामने चुनौतियां पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं. मौसम दिन ब दिन बदल रहा है, खेती की लागत भी बढ़ती जा रही है, साथ ही जमीन की उर्वरता भी घटती जा रही है. ऐसे में सही फसल चुनना अब बहुत जरूरी हो गया है. अक्सर किसान बिना सही जानकारी के कुछ भी बो देते हैं, जो उनकी मिट्टी के हिसाब से बिल्कुल सही नहीं होती. नतीजा? मेहनत तो डबल हो जाती है, लेकिन पैदावार और मुनाफा उम्मीद से बहुत कम रह जाता है.

हर मिट्टी की अपनी ताकत और सीमा

एएमयू के भूगोल विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर सालेहा जमाल बताती हैं कि भारत की भौगोलिक संरचना बेहद विविध है. देश में कहीं पहाड़ हैं, कहीं रेगिस्तान, कहीं उपजाऊ मैदान तो कहीं पठारी क्षेत्र. इसी वजह से यहां अलग-अलग प्रकार की मिट्टियां पाई जाती हैं. हर मिट्टी की अपनी खासियत होती है और वह कुछ विशेष फसलों के लिए ही ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है. अगर किसान मिट्टी की पहचान करके फसल चुनें, तो उत्पादन और आमदनी दोनों बढ़ाई जा सकती हैं.

जलोढ़ मिट्टी: खेती की रीढ़

प्रोफेसर सालेहा जमाल के अनुसार जलोढ़ मिट्टी को देश की सबसे उपजाऊ मिट्टी माना जाता है. यह मिट्टी मुख्य रूप से इंडो-गंगा के मैदानी क्षेत्रों और उत्तर भारत में पाई जाती है. इसमें पोषक तत्वों की मात्रा अच्छी होती है, जिससे गेहूं, धान और गन्ने जैसी फसलों की पैदावार शानदार होती है. यही वजह है कि इन इलाकों को देश का ‘अन्न भंडार’ कहा जाता है और यहां के किसानों को अपेक्षाकृत बेहतर आमदनी मिलती है.

काली, लाल और लेटराइट मिट्टी की खेती

महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में जो काली मिट्टी है, ये पानी को लंबे टाइम तक रखती है. ऐसे में कपास और मूंगफली जैसी फसलें इसमें बड़े अच्छे से उगती हैं और मुनाफा भी बढ़िया मिलता है.

दक्षिण भारत जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक और ओडिशा में लाल मिट्टी मिलती है. यहां दाल, तिल जैसी फसलें खूब बढ़िया उगती हैं. कुछ जगहों पर लेटराइट मिट्टी भी है, जो चाय, रबर और नारियल जैसी बागान वाली फसलों के लिए सोने पे सुहागा है. ऐसे में अगर किसान अपनी मिट्टी को अच्छे से जान ले, तो फसल सही चुने और कमाई में भी बंपर उछाल आ सकता है.

पहाड़ी इलाकों में फल और मसालों की चमक

पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों की मिट्टी फल और मसालों की खेती के लिए काफी अनुकूल होती है. इसी कारण भारत फल और मसालों के उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है. हालांकि, एक ही क्षेत्र में अलग-अलग फसलें उगाई जा सकती हैं, लेकिन इसके लिए मिट्टी की सही जांच और समझ बेहद जरूरी है.

सॉयल हेल्थ कार्ड योजना

किसानों को मिट्टी की सही जानकारी देने के लिए सरकार ने वर्ष 2015 में सॉयल हेल्थ कार्ड योजना की शुरुआत की थी. इस योजना के तहत मिट्टी की जांच कर उसमें मौजूद पोषक तत्वों और खाद की जरूरत की जानकारी दी जाती है. किसान सॉयल टेस्टिंग लैब में मिट्टी की जांच करवा सकते हैं. वर्ष 2026 तक इस योजना के तहत करीब 25 से 26 करोड़ किसानों को सॉयल हेल्थ कार्ड जारी किए जा चुके हैं.

लागत घटी, पैदावार बढ़ी

प्रोफेसर सालेहा जमाल के मुताबिक, सॉयल हेल्थ कार्ड के इस्तेमाल से उर्वरकों की खपत में 8 से 10 प्रतिशत तक कमी आई है. इससे किसानों की लागत घटी है और पर्यावरण को भी फायदा हुआ है. साथ ही फसलों की उपज में 6 से 8 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. साफ है कि मिट्टी की सही पहचान और संतुलित खेती किसानों के भविष्य को सुरक्षित बना सकती है.

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Published: 23 Jan, 2026 | 06:00 AM

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