टिश्यू कल्चर केले की खेती करेंगे किसान, बागवानी विभाग बताएगा ज्यादा पैदावार पाने की ट्रिक

कर्नाटक का बागवानी विभाग किसानों को अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफे के लिए टिश्यू कल्चर केले की खेती अपनाने की सलाह दे रहा है. विभाग के अनुसार, ये पौधे रोगमुक्त, एक समान बढ़ने वाले और अधिक उपज देने वाले हैं. हालांकि शुरुआती लागत अधिक है, लेकिन बेहतर गुणवत्ता और ऊंचे उत्पादन से किसानों को लंबे समय में ज्यादा लाभ मिलता है.

Kisan India
नोएडा | Published: 30 May, 2026 | 06:06 PM

Banana Cultivation: कर्नाटक के बागवानी विभाग ने किसानों को अधिक उत्पादन और बेहतर आमदनी के लिए टिश्यू कल्चर केले की खेती अपनाने की सलाह दी है. विभाग का कहना है कि राज्य में केले की उत्पादकता राष्ट्रीय औसत से काफी कम है, क्योंकि कई किसान अब भी पारंपरिक और पुराने पौधों का इस्तेमाल कर रहे हैं. विभाग के अनुसार, भारत में करीब 9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती होती है और सालाना लगभग 383 लाख टन उत्पादन होता है. वहीं, कर्नाटक में 46,000 हेक्टेयर क्षेत्र से केवल 12 लाख टन उत्पादन हो रहा है, जिसकी उत्पादकता 26 टन प्रति हेक्टेयर है. यह राष्ट्रीय औसत 42 टन प्रति हेक्टेयर से काफी कम है.

कर्नाटक में केले की पैदावार बढ़ाने के लिए बागवानी विभाग किसानों को टिश्यू कल्चर तकनीक  से तैयार पौधों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. किसानों को जागरूक करने के लिए विभाग ने पारंपरिक केले के पौधों और प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए टिश्यू कल्चर पौधों के बीच 13 प्रमुख अंतर भी बताए हैं. विभाग के अनुसार, पारंपरिक केले के पौधों का उपयोग करने पर बगीचे में रोग और कीट तेजी से फैलने का खतरा रहता है. इसके विपरीत, टिश्यू कल्चर पौधे नियंत्रित वातावरण में प्रयोगशाला में तैयार किए जाते हैं, इसलिए वे पूरी तरह रोगमुक्त और स्वस्थ होते हैं.

टिश्यू कल्चर खेती के फायदे

विभाग का कहना है कि टिश्यू कल्चर पौधों की जीवित रहने की क्षमता अधिक होती है, जबकि पारंपरिक पौधों में पौधों के नष्ट होने की संभावना ज्यादा रहती है. इससे किसानों को बेहतर उत्पादन और अधिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाती है. बागवानी विभाग के अनुसार, पारंपरिक केले के पौधों  की खेती में पौधों की बढ़वार एक समान नहीं होती. इसके कारण फसल अलग-अलग समय पर तैयार होती है, जिससे कटाई और विपणन में परेशानी आती है. वहीं, टिश्यू कल्चर से तैयार पौधे एक समान गति से बढ़ते हैं और पूरी फसल लगभग एक ही समय पर तैयार हो जाती है. इससे किसान बाजार की मांग के अनुसार एक साथ कटाई कर बेहतर कीमत प्राप्त कर सकते हैं.

उपज और फलों की गुणवत्ता के मामले में भी टिश्यू कल्चर तकनीक को अधिक लाभकारी माना जाता है. इस तकनीक से तैयार पौधों में उत्पादन अधिक और स्थिर रहता है. इनके फल आकार में बड़े, एक समान और बेहतर गुणवत्ता वाले होते हैं. इसके विपरीत, पारंपरिक पौधों में उपज कम और अनिश्चित रहती है तथा फलों के आकार और गुणवत्ता में काफी भिन्नता देखने को मिलती है.

पानी और उर्वरक का कम असर

बागवानी विभाग के अनुसार, पारंपरिक केले की खेती में पानी और उर्वरकों का उपयोग  अक्सर कम प्रभावी होता है और रोगों के अधिक प्रकोप के कारण फसल प्रबंधन भी मुश्किल हो जाता है. इसके विपरीत, टिश्यू कल्चर पौधों में पानी और खाद का बेहतर उपयोग होता है, जिससे संसाधनों की बर्बादी कम होती है. साथ ही, इन पौधों में रोगों का खतरा कम होने के कारण बीमारी का प्रबंधन भी आसान रहता है.

टिश्यू कल्चर पौधों की शुरुआती लागत

लागत के लिहाज से देखा जाए तो पारंपरिक केले के पौधे खरीदना शुरुआत में सस्ता पड़ता है, जबकि टिश्यू कल्चर पौधों की शुरुआती लागत अधिक होती है. लेकिन लंबे समय में टिश्यू कल्चर खेती किसानों के लिए अधिक फायदेमंद साबित होती है.. पारंपरिक खेती में मिट्टी में रोग जमा होने का खतरा रहता है और रखरखाव व मजदूरी का खर्च भी बढ़ सकता है. वहीं, टिश्यू कल्चर पौधों की देखभाल आसान होती है, श्रम लागत कम लगती है और बेहतर गुणवत्ता वाले फलों को बाजार में अच्छी कीमत मिलने से किसानों को अधिक मुनाफा होता है.

 

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Published: 30 May, 2026 | 06:06 PM

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