किसानों के लिए सुनहरा मौका, 50 फीसदी सब्सिडी के साथ करें इस फसल की खेती, बचेंगी 3 बोरी यूरिया

Dhaincha Farming: खरीफ सीजन से पहले किसान ढैंचा (सेसबेनिया) की खेती करके प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत कर सकते हैं. यह हरी खाद वाली फसल मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाती है, जिससे उर्वरकों पर खर्च कम होता है और जमीन की उर्वरता भी सुधरती है. कृषि विभाग ढैंचा के बीज पर 50 फीसदी तक सब्सिडी दे रहा है.

Isha Gupta
नोएडा | Published: 7 Jun, 2026 | 08:58 AM

Dhaincha Seed Subsidy: खेती में बढ़ती लागत आज किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गई है. खासकर रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते दाम किसानों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं. ऐसे में कृषि विभाग किसानों को एक ऐसी तकनीक अपनाने की सलाह दे रहा है, जिससे खेती की लागत कम हो सकती है और मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रह सकती है. इसके लिए किसानों को खरीफ फसलों की बुवाई से पहले ढैंचा (सेसबेनिया) की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

सबसे अच्छी बात यह है कि ढैंचा के बीज पर किसानों को 50 प्रतिशत तक सब्सिडी भी दी जा रही है. इससे किसान कम खर्च में अपनी जमीन की उर्वरता बढ़ा सकते हैं और अगली फसल में उर्वरकों की जरूरत भी कम कर सकते हैं.

क्या है ढैंचा और क्यों है फायदेमंद?

ढैंचा एक हरी खाद वाली दलहनी फसल है. इसकी खासियत यह है कि यह हवा में मौजूद नाइट्रोजन को अपनी जड़ों के जरिए मिट्टी में जमा करती है. जब इस फसल को खेत में पलट दिया जाता है, तो यह सड़कर जैविक खाद में बदल जाती है और मिट्टी को प्राकृतिक पोषक तत्व उपलब्ध कराती है. धान-गेहूं, धान-चना, धान-सब्जी और सोयाबीन आधारित फसल चक्र अपनाने वाले किसानों के लिए ढैंचा की खेती काफी लाभदायक साबित हो सकती है.

प्रति हेक्टेयर 2 से 3 बोरी यूरिया की बचत

कृषि विभाग का कहना है कि ढैंचा को खेत में मिलाने से प्रति हेक्टेयर लगभग 40 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी को प्राकृतिक रूप से मिल जाती है. इतनी नाइट्रोजन पाने के लिए सामान्य तौर पर किसानों को 90 से 130 किलोग्राम तक यूरिया का इस्तेमाल करना पड़ता है. यानी अगर किसान ढैंचा की खेती करते हैं, तो उन्हें अगली फसल में करीब 2 से 3 बोरी यूरिया कम इस्तेमाल करनी पड़ सकती है. इससे उर्वरकों पर होने वाला खर्च घटेगा और खेती ज्यादा लाभकारी बन सकेगी.

ढैंचा की बुवाई कैसे करें?

कृषि विभाग के अनुसार मानसून की शुरुआत ढैंचा की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है. एक हेक्टेयर जमीन के लिए लगभग 25 से 30 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है. बुवाई के करीब 35 से 40 दिन बाद, जब पौधे 1 से 1.5 मीटर तक ऊंचे हो जाएं और उनमें फूल आने से पहले की अवस्था हो, तब उन्हें खेत में पलट देना चाहिए. इसके लिए किसान रोटावेटर, डिस्क हैरो या मिट्टी पलटने वाले हल का उपयोग कर सकते हैं.

खेत में पलटने के बाद पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी होता है. करीब 15 से 20 दिनों में ढैंचा पूरी तरह गलकर जैविक खाद में बदल जाता है. इसके बाद किसान धान या अन्य खरीफ फसलों की बुवाई कर सकते हैं.

मिट्टी की सेहत भी होगी बेहतर

लगातार रासायनिक खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की ताकत धीरे-धीरे कम होने लगती है. ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसल मिट्टी को फिर से उपजाऊ बनाने में मदद करती है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, ढैंचा को खेत में मिलाने के बाद यह सड़कर मिट्टी में प्राकृतिक पोषक तत्व बढ़ाता है. इससे मिट्टी में नाइट्रोजन और जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, जो फसलों की अच्छी बढ़वार के लिए जरूरी होते हैं. इसके अलावा मिट्टी भुरभुरी बनती है, पानी को ज्यादा देर तक रोककर रखती है और पौधों की जड़ों का विकास भी बेहतर होता है. साथ ही मिट्टी में मौजूद अच्छे सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे फसलों को पोषक तत्व आसानी से मिल पाते हैं.

बीज खरीदने पर मिलेगा 50 फीसदी अनुदान

कृषि विभाग किसानों को ढैंचा के बीज पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दे रहा है. किसान अपने नजदीकी कृषि विभाग कार्यालय, बीज निगम केंद्र या बीज प्रसंस्करण केंद्र से संपर्क कर रियायती दर पर बीज प्राप्त कर सकते हैं.

किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है यह पहल

कृषि विभाग का मानना है कि मानसून शुरू होते ही ढैंचा की बुवाई करने से किसानों की उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और आने वाली फसलों का उत्पादन भी बेहतर होगा. यह तकनीक खेती की लागत कम करने के साथ-साथ टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल खेती को भी बढ़ावा देती है. ऐसे में खरीफ सीजन की तैयारी कर रहे किसानों के लिए ढैंचा की खेती एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है.

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