खेती-किसानी में अब धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल रहा है. किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ ऐसी खेती की तरफ भी बढ़ रहे हैं, जिसमें कम लागत में ज्यादा मुनाफा मिल सके. इन्हीं फसलों में बांस की खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है. पहले बांस को सिर्फ घर बनाने, टोकरी तैयार करने या ग्रामीण उपयोग की चीजों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब इसकी मांग बड़े उद्योगों तक पहुंच चुकी है.
आज बांस का इस्तेमाल फर्नीचर, सजावटी सामान, कागज, कपड़ा, बायो-फ्यूल और निर्माण कार्यों में बड़े स्तर पर किया जा रहा है. यही वजह है कि सरकार भी किसानों को बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है. केंद्र सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को आर्थिक सहायता और सब्सिडी दे रही है ताकि किसान अपनी आय बढ़ा सकें और खाली पड़ी जमीन का सही इस्तेमाल कर सकें.
किसानों के लिए क्यों फायदेमंद है बांस की खेती?
बांस की खेती ऐसी खेती है जिसमें एक बार मेहनत करने के बाद लंबे समय तक कमाई होती रहती है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि बांस का पौधा तेजी से बढ़ता है और एक बार तैयार हो जाने के बाद 40 से 50 साल तक लगातार उत्पादन देता रहता है.
इस खेती में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती और महंगे कीटनाशकों पर भी ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता. यही कारण है कि कम लागत में अच्छी आमदनी चाहने वाले किसानों के लिए यह एक बेहतर विकल्प बनता जा रहा है.
सरकार दे रही 50 प्रतिशत तक सब्सिडी
राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत सरकार किसानों को बांस के पौधे लगाने के लिए आर्थिक मदद देती है. इस योजना में लागत का बड़ा हिस्सा सरकार खुद उठाती है ताकि किसानों पर आर्थिक बोझ कम पड़े.
आमतौर पर किसानों को 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है. यह राशि सीधे किसानों के बैंक खाते में भेजी जाती है. खास बात यह है कि यह मदद केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि पौधों की देखभाल और सुरक्षा के लिए भी तीन साल तक अलग-अलग किस्तों में सहायता दी जाती है. सरकार का उद्देश्य है कि किसान बिना ज्यादा जोखिम के बांस की खेती शुरू कर सकें.
बंजर जमीन को भी बना सकती है कमाई का जरिया
कई किसानों के पास ऐसी जमीन होती है जो खेती के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं मानी जाती. ऐसी जमीन पर भी बांस की खेती आसानी से की जा सकती है. बांस का पौधा कई तरह की मिट्टी में उग जाता है और ज्यादा देखभाल भी नहीं मांगता. यही वजह है कि बंजर या खाली पड़ी जमीन को भी किसान कमाई का साधन बना सकते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सही तरीके से खेती की जाए तो कुछ वर्षों में किसान लाखों रुपये तक की कमाई कर सकते हैं.
पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद
बांस की खेती सिर्फ कमाई का जरिया नहीं है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बेहद उपयोगी मानी जाती है. बांस कार्बन डाइऑक्साइड को तेजी से सोखता है और वातावरण को साफ रखने में मदद करता है. इसके अलावा यह मिट्टी के कटाव को भी रोकता है. पहाड़ी और बारिश वाले इलाकों में बांस की खेती मिट्टी को बहने से बचाने में काफी मददगार साबित होती है. इसी वजह से सरकार पर्यावरण संरक्षण के नजरिए से भी बांस की खेती को बढ़ावा दे रही है.
बाजार में लगातार बढ़ रही मांग
पहले बांस का उपयोग सीमित था, लेकिन अब इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है. आज फर्नीचर उद्योग, कागज उद्योग, निर्माण कार्य, सजावटी सामान बनाने वाली कंपनियां और कपड़ा उद्योग भी बड़े पैमाने पर बांस का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके अलावा बायो-फ्यूल और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की बढ़ती मांग ने भी बांस की कीमत बढ़ा दी है.
कई कंपनियां सीधे किसानों से संपर्क कर बांस खरीद रही हैं. इससे किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी पड़ती.
किसानों को बाजार से भी जोड़ा जा रहा
राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को सिर्फ सब्सिडी ही नहीं दी जा रही, बल्कि उन्हें मंडियों और प्रोसेसिंग यूनिट्स से भी जोड़ा जा रहा है. सरकार चाहती है कि किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिले और उन्हें बाजार तक पहुंचने में परेशानी न हो. इसके लिए कई राज्यों में प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता भी दी जा रही है.
नर्सरी खोलने पर भी मिलती है मदद
अगर कोई किसान खुद की बांस नर्सरी शुरू करना चाहता है तो सरकार उसके लिए भी आर्थिक सहायता देती है. नर्सरी तैयार करने के लिए लाखों रुपये तक का फंड और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जाता है. इससे किसान खेती के साथ पौध तैयार करने का काम भी शुरू कर सकते हैं.
लंबी अवधि की सुरक्षित कमाई
विशेषज्ञों का मानना है कि बांस की खेती भविष्य की खेती मानी जा रही है. एक बार पौधा तैयार होने के बाद कई वर्षों तक लगातार उत्पादन मिलता रहता है. कम जोखिम, कम लागत और लगातार बढ़ती मांग के कारण यह खेती किसानों के लिए सुरक्षित कमाई का विकल्प बन रही है.
आवेदन प्रक्रिया
- सबसे पहले राष्ट्रीय बांस मिशन की आधिकारिक वेबसाइट nbm.da.gov.in पर जाकर पंजीकरण करना होगा.
- आवेदन करते समय आधार कार्ड, बैंक खाते की जानकारी और जमीन से जुड़े दस्तावेज जमा करने होंगे.
- सब्सिडी की राशि सीधे किसान के बैंक खाते में भेजी जाती है.
- किसान अपने जिले के कृषि विभाग कार्यालय से भी योजना की जानकारी ले सकते हैं.
- नजदीकी सरकारी नर्सरी या कृषि केंद्र से पौध और तकनीकी सलाह भी प्राप्त की जा सकती है.