छत्तीसगढ़ में पाम की खेती का रकबा बढ़ा, सरकार किसानों को दे रही 1.23 लाख रुपये.. उपज भी खरीदेगी
Palm Farming Scheme: आयल पाम योजना के तहत पाम की खेती करने वाले किसानों को पौधे उपलब्ध कराने के साथ खेतों में जरूरी सुविधाएं विकसित करने के लिए अनुदान दिया जा रहा है. प्रति किसान बोरिंग, फेंसिंग आदि के लिए 1.23 लाख रुपये की मदद दी जा रही है.
पाम आयल के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई आयल पाम योजना का असर छत्तीसगढ़ में देखा जा रहा है. राज्य के जशपुर जिले में उद्यानिक विभाग की ओर से ऊंचाई वाली जमीन, जहां पानी पहुंचना मुश्किल होता है वहां पर पाम की खेती को बढ़ावा देने से 100 हेक्टेयर में प्लांटेशन किया जा रहा है. पहले चरण में 80 किसानों से शुरुआत की गई है, जो बढ़ाकर 1 हजार किसानों तक प्रस्तावित है. राज्य सरकार की ओर से किसानों को बोरिंग, सिंचाई, फेंसिंग के लिए अनुदान के रूप में 1.23 लाख रुपये भी दिए जा रहे हैं.
उद्यानिकी विभाग ने शुरू कराई पाम की खेती
छत्तीसगढ़ सरकार ने उद्यानिकी विभाग को 1 हजार हेक्टेयर में पाम की खेती कराने के निर्देश दिए हैं. इसके तहत पहले चरण में जशपुर जिले में 100 हेक्टेयर क्षेत्र में पाम के पौधे लगाने की शुरूआत की गई है. इसके मुकाबले अब तक 40 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण पूरा हो चुका है और जिले के सात ब्लाकों के 80 किसान इस योजना से जुड़ चुके हैं. सरकारी मदद मिलने से पाम की खेती को लेकर किसानों में भी उत्साह देखा जा रहा है.
बोरिंग, सिंचाई, फेंसिंग के लिए मिल रहे 1.23 लाख रुपये
आयल पाम योजना के तहत पाम की खेती करने वाले किसानों को पौधे उपलब्ध कराने के साथ खेतों में जरूरी सुविधाएं विकसित करने के लिए अनुदान दिया जा रहा है. योजना के अंतर्गत प्रति एकड़ 143 पाम पौधे देने का प्रावधान है. पौधों को मवेशियों से बचाने के लिए फेसिंग लगाने के लिए प्रति हेक्टेयर 54 हजार रुपये, बोर के लिए 50 हजार रुपये और ड्रिप सिंचाई के लिए प्रति हेक्टेयर 14 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता है. इसके अलावा पौधों की देखरेख के लिए सालाना 5250 रुपये का अनुदान देने का प्रावधान है. किसान इस राशि का उपयोग पौधों के लिए खाद और दवा खरीदने में कर सकेंगे.
जशुपर के 7 ब्लॉक क्षेत्रों में किसान कर रहे पाम की खेती
जशपुर जिले में योजना को उद्यानिकी विभाग प्रोत्साहित कर रहा है. सहायक संचालक उद्यानिकी करण सोनकर ने मीडिया को बताया कि जिले के 7 ब्लाकों में अब तक 80 किसान योजना से जुड़ चुके हैं और 40 हेक्टेयर में पौधरोपण पूरा किया जा चुका है. राईपाठ और पोरतेंगा गांवों में किसानों ने शुरू की पाम की खेती जशपुर शहर के नजदीकी ग्राम राईपाठ के किसान अलेक्जेंडर टोप्पो ने बताया कि उनके गांव में उनके साथ अन्य किसानों ने भी पाम की खेती शुरू की है.
पाम उगाने के लिए रामतिल की खेती छोड़ी
उन्होंने कहा कि गांव में बसील खलखो ने 10 एकड़, राजू रंजन तिग्गा ने ढाई एकड़ और किशोर तिग्गा ने सात एकड़ में पाम के पौधे लगाए हैं. इसके अलावा ग्राम पोरतेंगा में शिक्षक जितेंद्र नाथ सिंह ने योजना के तहत सात एकड़ भूमि में पाम के पौधों का रोपण किया है. जितेंद्र नाथ सिंह का कहना है कि पाम की खेती किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती है. उन्होंने बताया कि पाम के पौधे लगाने से पहले वे अपनी जमीन पर गूंजा यानी रामतिल की खेती करते थे. इससे उन्हें पूरे साल में बमुश्किल 20 से 30 हजार रुपये की आय हो पाती थी. अब पाम की खेती शुरू करने के बाद उन्हें आने वाले समय में इससे बेहतर आमदनी की उम्मीद है.
किसान जितेंद्र नाथ सिंह ने पाम की खेती की है.
एक सीजन में 71 हजार रुपये का मुनाफा होगा
शिक्षक जितेंद्र नाथ सिंह ने कहा कि करीब चार साल बाद 42 टन पाम उत्पादन की उम्मीद है और इससे एक सीजन में 71 हजार रुपये से अधिक का मुनाफा होने की संभावना है. किसान अलेक्जेंडर टोप्पो ने बताया कि पाम उपज की खरीदी सरकार किसानों के खेतों से ही करेगी. इससे किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए बाजार तलाशने की जरूरत नहीं पड़ेगी. किसानों के मुताबिक उपज की खरीदी सुनिश्चित होने से पाम की खेती को लेकर उनका भरोसा और बढ़ा है.
पाम के साथ दूसरी फसलें भी उगा सकते हैं किसान
उद्यानिकी विभाग के सहायक संचालक करण सोनकर ने बताया कि पाम के पौधे 9 बाई 9 की दूरी पर लगाए जाते हैं. इस वजह से पौधों के बीच पर्याप्त स्थान उपलब्ध रहता है और किसान उस जगह पर सब्जियों सहित दूसरी फसलें लेकर अतिरिक्त आय कमा सकते हैं. योजना के तहत मिलने वाली अनुदान राशि से किसानों के खेतों में फेसिंग और सिंचाई की सुविधा भी विकसित की जा रही है. इससे एक ओर पाम के पौधों को मवेशियों से सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर सिंचाई सुविधा उपलब्ध होने से किसान पाम के साथ अन्य फसलें भी ले सकेंगे. इस तरह किसान एक ही जमीन से पाम के अलावा अन्य फसलों के जरिए अतिरिक्त आमदनी हो सकेगी.