अल नीनो की आहट के बीच राहत की खबर! स्टॉक में मौजूद हैं 30 फीसदी अधिक खरीफ बीज

धान की खेती वाले प्रमुख राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना में किसानों को कम अवधि वाली धान की किस्में अपनाने की सलाह दी गई है. वहीं, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में मक्का की खेती की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है.

Kisan India
नोएडा | Published: 28 Jun, 2026 | 03:29 PM

Seed stores: अल नीनो के चलते इस साल मॉनसून के कमजोर और देरी से आने की आशंका है. इसी बीच देश की निजी बीज कंपनियों ने खरीफ सीजन के लिए 20 से 30 प्रतिशत अतिरिक्त बीज का भंडार तैयार किया है. हालांकि, बीजों की उपलब्धता से ज्यादा चिंता उन्हें समय पर कम बारिश वाले और प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचाने की है, ताकि किसान बुवाई में देरी से बच सकें.

न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष अजय राणा ने कहा कि मक्का, धान और मोटे अनाज के बीजों का उत्पादन इस बार अच्छा रहा है, जिससे पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है. उन्होंने कहा  कि 1,000 किसानों पर किए गए एक सर्वे में 75 प्रतिशत किसानों ने पहले ही बीज खरीद लिए हैं, जबकि 25 प्रतिशत किसान मॉनसून का इंतजार कर रहे हैं. ऐसे में बुवाई का समय खत्म होने से पहले अतिरिक्त स्टॉक वाले क्षेत्रों से जरूरतमंद जिलों तक बीज पहुंचाना बेहद जरूरी है.

30 प्रतिशत तक अतिरिक्त बीज मौजूत

बीज उद्योग आमतौर पर मांग में उतार-चढ़ाव और बीज वापसी की स्थिति को देखते हुए 15 से 20 प्रतिशत अतिरिक्त स्टॉक रखता है. इस साल बीज उत्पादन अच्छा रहने के कारण कंपनियों के पास 20 से 30 प्रतिशत तक अतिरिक्त बीज उपलब्ध हैं. एफएसआईआई के अध्यक्ष अजय राणा ने कहा कि यदि कमजोर या देरी से मॉनसून के कारण किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ती है, तो सरकार और निजी कंपनियों के पास मौजूद अतिरिक्त बीज स्टॉक उनकी जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा. हालांकि, उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती बीजों की कुल उपलब्धता नहीं, बल्कि उन्हें समय पर जरूरत वाले और कम बारिश वाले क्षेत्रों तक पहुंचाना है.

1.92 करोड़ क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध हैं

अजय राणा ने कहा कि कम अवधि में तैयार होने वाली और जलवायु के अनुकूल बीज किस्में कम बारिश वाले और प्रभावित जिलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा कि खरीफ सीजन के लिए सरकार के पास 1.92 करोड़ क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध हैं, जबकि जरूरत करीब 1.73 करोड़ क्विंटल की है. यानी मांग के मुकाबले 11.2 प्रतिशत अधिक बीज मौजूद हैं. इसके अलावा निजी क्षेत्र ने भी अतिरिक्त स्टॉक तैयार कर रखा है.

मॉनसून में देरी का असर पड़ सकता है

सरकार ने देश के 12 राज्यों के 315 जिलों को ऐसे क्षेत्रों के रूप में चिन्हित किया है, जहां मॉनसून में देरी का असर पड़ सकता है. राणा ने कहा कि भारत की करीब 50 प्रतिशत खेती अब भी बारिश पर निर्भर है, इसलिए अल नीनो का प्रभाव खरीफ फसलों के लिए चिंता का विषय है. उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के कुछ हिस्सों में बुवाई में देरी हो रही है, जबकि पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे सिंचित क्षेत्रों पर इसका असर अपेक्षाकृत कम है.

एफएसआईआई के अध्यक्ष अजय राणा ने कहा कि यदि जुलाई और अगस्त में भी मॉनसून कमजोर रहता है, तो किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली और अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों की खेती अपनानी चाहिए. उन्होंने सलाह दी कि किसान मौसम के अनुसार खेती की तकनीकों में भी बदलाव करें, जैसे धान की फसल में उर्वरकों का समय पर उपयोग करना.

हाइब्रिड बीज कम समय में हो जाते हैं तैयार

राणा ने यह भी कहा कि हाइब्रिड बीजों को लेकर यह धारणा गलत है कि उन्हें अधिक पानी और खाद की जरूरत होती है. उनके अनुसार, हाइब्रिड किस्में अक्सर कम पानी और कम उर्वरक में बेहतर उत्पादन देती हैं. उदाहरण के तौर पर, पंजाब और हरियाणा में हाइब्रिड धान को 2 बोरी यूरिया की जरूरत पड़ती है, जबकि सामान्य किस्मों में 3 से 4 बोरी यूरिया लगती है. साथ ही हाइब्रिड फसल लगभग 15 दिन पहले तैयार हो जाती है. उन्होंने कहा कि देशभर में किसान अब जल्दी और मध्यम अवधि में पकने वाली फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. इसी को ध्यान में रखते हुए बीज उद्योग ने पर्याप्त मात्रा में ऐसे बीजों का उत्पादन और भंडारण किया है.

कम अवधि वाले धान की खेती करने की सलाह

धान की खेती वाले प्रमुख राज्यों जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना में किसानों को कम अवधि वाली धान की किस्में अपनाने की सलाह दी गई है. वहीं, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में मक्का की खेती की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है. राणा ने कहा कि ज्वार और बाजरा जैसी मोटे अनाज की फसलें कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं और इनके पर्याप्त बीज उपलब्ध हैं.

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