अध्ययन में खुलासा, पंजाब में लगातार धान-गेहूं की खेती से कमजोर हुई मिट्टी की गुणवत्ता

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के अध्ययन में लगातार धान-गेहूं की खेती से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होने की बात सामने आई है. केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि धान का रकबा बढ़ा है, जबकि जल संकट वाले क्षेत्रों में भी पानी अधिक मांगने वाली फसलें उगाई जा रही हैं. सरकार अब फसल विविधीकरण और भूजल संरक्षण पर जोर दे रही है.

नोएडा | Published: 5 Aug, 2026 | 03:30 PM

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के एक अध्ययन में सामने आया है कि लंबे समय तक लगातार धान-गेहूं की खेती (मोनोक्रॉपिंग) करने से राज्य की मिट्टी की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ रहा है. लोकसभा में एक लिखित जवाब में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा कि एक ही फसल चक्र अपनाने, धान की रोपाई के दौरान बार-बार पडलिंग (खेत में पानी भरकर मिट्टी तैयार करना), गहरी जुताई और दलहनी फसलों या हरी खाद का इस्तेमाल नहीं करने से मिट्टी कमजोर होती है.

मंत्री ने कहा कि धान की रोपाई के लिए की जाने वाली पडलिंग से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना  प्रभावित होती है. इससे मिट्टी के भीतर हवा और पानी के आने-जाने की क्षमता कम हो जाती है और नीचे की परत सख्त हो जाती है, जिससे मिट्टी की सेहत पर नकारात्मक असर पड़ता है. हालांकि, उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तरीके अपनाकर इस नुकसान की काफी हद तक भरपाई की जा सकती है. इसके लिए फसल चक्र में दलहनी फसलें शामिल करना, हरी खाद का उपयोग, संतुलित उर्वरकों का प्रयोग, एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM), जैविक खाद डालना और फसल अवशेषों को खेत में मिलाना जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी गई है. इन तरीकों से मिट्टी की उर्वरता और सेहत को फिर से बेहतर बनाया जा सकता है.

धान की खेती का रकबा बढ़ा

केंद्र सरकार ने लोकसभा में कहा है कि पंजाब में पिछले कुछ वर्षों के दौरान धान की खेती का रकबा बढ़ा है. वर्ष 2021-22 में राज्य में 29.69 लाख हेक्टेयर में धान की खेती होती थी, जो 2025-26 में बढ़कर 32.68 लाख हेक्टेयर हो गई. वहीं, गेहूं का रकबा लगभग स्थिर रहा और यह 35.25 लाख हेक्टेयर से मामूली घटकर 34.58 लाख हेक्टेयर रह गया. सरकार ने बताया कि इसी अवधि में धान-गेहूं के अलावा दूसरी फसलों, जैसे मक्का, दलहन और तिलहन का कुल रकबा 8.6 प्रतिशत से घटकर 6.2 प्रतिशत रह गया. हालांकि, फल और सब्जियों जैसी बागवानी फसलों का हिस्सा 6.3 प्रतिशत से बढ़कर 7.2 प्रतिशत हो गया है. इससे पता चलता है कि राज्य में बागवानी की ओर थोड़ा रुझान बढ़ा है, लेकिन अब भी पंजाब में धान-गेहूं की खेती का दबदबा बना हुआ है.

सालाना 650 मिमी से कम बारिश होती है

लोकसभा में एक अन्य सवाल के जवाब में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने बताया कि देश में धान, गन्ना, कपास और जूट जैसी अधिक पानी की जरूरत वाली फसलें बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं. इन फसलों का कुल रकबा करीब 6.27 करोड़ हेक्टेयर है, जो देश के कुल बोए गए क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है. उन्होंने कहा कि बदलते जल संकट को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इन फसलों की खेती और पानी की उपलब्धता का अध्ययन किया है. अध्ययन में पाया गया कि 68 ऐसे जिलों में, जहां सालाना 650 मिमी से कम बारिश होती है, करीब 28.9 लाख हेक्टेयर में धान की खेती की जा रही है. यह देश के कुल धान रकबे (करीब 5.1 करोड़ हेक्टेयर) का लगभग 5.67 प्रतिशत है.

7.21 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती

इसी तरह, 91 ऐसे जिलों में, जहां सालाना 700 मिमी से कम बारिश होती है, करीब 7.21 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती  हो रही है. यह देश के कुल गन्ना रकबे (करीब 67 लाख हेक्टेयर) का लगभग 10.76 प्रतिशत है. सरकार का कहना है कि स्थानीय जल उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए फसल चक्र अपनाना समय की जरूरत है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने लोकसभा में कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि कम पानी वाले क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार फसलों का चयन करना जरूरी है. इससे भूजल संरक्षण, किसानों की आय और कृषि उत्पादन के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है. सरकार ऐसे क्षेत्रों में फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है.

 

Topics: