बरसात के मौसम में फसलों में कीटों और रोगों का होना आम बात है, जिससे न केवल फसलें खराब होती हैं, बल्कि किसानों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है. ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे समय रहते इन रोगों और कीटों की पहचान करें और उनसे बचाव के उपाय अपनाएं. आजकल किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ फलदार फसलें भी उगाने लगे हैं. इनमें से एक प्रमुख फल है केला, जिसकी बाजार में हमेशा मांग रहती है और इसलिए किसान इसकी खेती बड़े पैमाने पर करते हैं. लेकिन केले की फसल में अक्सर ‘पीला सीगाटोका रोग’का प्रकोप हो जाता है, जो फसल को पूरी तरह से नष्ट कर सकता है. इस समस्या से बचने के लिए बिहार कृषि विभाग ने किसानों के लिए एक एडवाइजरी जारी की है, जिसमें रोग से बचने के उपाय बताए गए हैं. इन उपायों को अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं.
क्या है पीला सीगाटोका रोग
केले की फसल पर लगने वाले पीला सीागाटोका रोग एक फफूंद जनक रोग है, जो कि फंगस के कारण होता है. मुख्य रूप से इस रोग के संक्रमण की शुरुआत केले के पत्तों से होती है. अगर किसान समय रहते इस रोग को कंट्रोल नहीं करते हैं तो ये खतरनाक रोग पौधों की ग्रोथ, फल की क्वालिटी और फसल से होने वाली पैदावार पर बुरा असर डाल सकता है. इसलिए किसानों के लिए बेहद जरूरी है कि वे सरकार द्वारा जारी की गई एडवाइजरी के निर्देशों का सख्ती से पालन करते हुए फसल का बचाव कर सकेंगे
इन लक्षणों से करें पहचान
पीला सीगाटोका रोग के कुछ लक्षण होते हैं जिनकी पहचान अगर समय रहते हो जाए तो किसान केले की फसल को बर्बाद होने से बचा सकते हैं. केले पर इस खतरनाक रोग के संक्रमण के कारण नए पत्ते की ऊपरी भाग पर हल्का पीला दाग या धारीदार लाईनें नजर आने लगती है. आगे चलकर यही धब्बे बड़े और भूरे रंग के होने लगते हैं. बता दें कि, इन धब्बों के बीच का हिस्सा हल्का कत्थई रंग का हो जाता है,
किसान ऐसे करें बचाव
बिहार कृषि विभाग द्वारा जारी की गई एडवाइजरी के अनुसार, किसानों को ये सलाह दी जाती है कि वे अपने खेत को स्वच्छ रखें और खरपतवार को न बढ़ने दें. किसानों को ध्यान रखना होगा कि वे खेतों में ज्यादा पानी न जमा होने दें. अगर खेत में पानी जमा हो तो खेत में सबसे पहले जल निकासी के लिए क्यारियां बनाएं ताकि पानी आसानी से निकल जाए. इसके अलावा 1 किलोग्राम ट्राइकोडरमा विरिड को 25 किलोग्राम गोबर खाद में मिलाकर प्रति एकड़ की दर से मिट्टी का उपचार करें.