रोजगार गारंटी कानून पर तेलंगाना का बड़ा दांव, गैर-BJP राज्यों के साथ बनाएगा साझा रणनीति

तेलंगाना सरकार केंद्र के प्रस्तावित रोजगार गारंटी ढांचे पर कानूनी और राजनीतिक विकल्पों पर विचार कर रही है. राज्य मंत्रिमंडल 2 जुलाई को इस पर फैसला ले सकता है. नागरिक संगठनों ने अलग राज्य कानून बनाने, 200 दिनों के रोजगार की गारंटी देने और प्रस्तावित 60:40 फंडिंग मॉडल की समीक्षा की मांग की है.

Kisan India
नोएडा | Published: 28 Jun, 2026 | 11:30 PM

Telangana News: तेलंगाना में रोजगार गारंटी कानून को लेकर बहस तेज हो गई है. सिविल सोसाइटी संगठनों ने राज्य सरकार से केंद्र के प्रस्तावित फ्रेमवर्क को अपनाने के बजाय अपना अलग रोजगार गारंटी कानून बनाने की मांग की है. वहीं, VB GRAM G एक्ट की समीक्षा के लिए गठित कैबिनेट उपसमिति ने इस मुद्दे पर साझा कानूनी और राजनीतिक रणनीति बनाने के लिए गैर-भाजपा शासित राज्यों से संपर्क करने का फैसला किया है. नागरिक आपूर्ति मंत्री एन. उत्तम कुमार रेड्डी की अध्यक्षता वाली उपसमिति ने कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्रियों से भी चर्चा करने का प्रस्ताव रखा है. इसका उद्देश्य यह जानना है कि क्या ये राज्य राज्यों के अधिकारों और वित्तीय हितों की रक्षा के लिए साझा कानूनी रणनीति अपनाने को तैयार हैं. बैठक में पंचायती राज मंत्री दानासरी अनसूया (सीतक्का) ने व्यक्तिगत रूप से भाग लिया, जबकि कृषि मंत्री तुम्मला नागेश्वर राव और श्रम मंत्री जी. विवेक वेंकटस्वामी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए.

सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी जा सकती है

बैठक के दौरान उपसमिति के सदस्यों ने कहा कि केंद्र सरकार का प्रस्तावित कानून राज्यों के संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप  करता है. उनका मानना है कि कानून के कई प्रावधान ऐसे हैं, जो अदालत में कानूनी जांच की कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते. कानूनी विशेषज्ञों ने भी समिति को बताया कि उन्हें कई ऐसे संवैधानिक मुद्दे मिले हैं, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी जा सकती है.

2,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ

बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि क्या तेलंगाना को केंद्र के दिशा-निर्देशों के अनुसार कानून लागू करने के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती देनी चाहिए. वहीं, बैठक में शामिल करीब 20 नागरिक समाज संगठनों के प्रतिनिधियों ने बिना राज्यों से सलाह-मशविरा किए बड़े बदलाव करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की. बैठक में शामिल संगठनों ने राज्य सरकार से केंद्र के प्रस्तावित ढांचे को अपनाने के बजाय संविधान के तहत अपना अलग रोजगार गारंटी कानून बनाने की मांग की. उनका कहना था कि केंद्र के प्रस्तावित मॉडल को लागू करने से राज्य पर करीब 2,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है. साथ ही, इससे हजारों कृषि मजदूरों के रोजगार के अवसर भी कम हो सकते हैं.

60 दिनों तक सीमित करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया

संगठनों ने रोजगार की अवधि को 60 दिनों तक सीमित करने के प्रस्ताव का भी विरोध किया. उन्होंने मांग की कि तेलंगाना में हर साल कम से कम 200 दिनों के रोजगार की गारंटी दी जाए और मजदूरों को कानूनी न्यूनतम मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए. बैठक में केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 फंडिंग व्यवस्था पर भी विस्तार से चर्चा हुई. उपसमिति ने फैसला किया कि अंतिम निर्णय लेने से पहले इस मुद्दे की कानूनी जांच राज्य के विधि विभाग से कराई जाएगी.

बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को नुकसान होगा

उपसमिति के सदस्यों ने प्रस्तावित फंड आवंटन व्यवस्था की भी आलोचना की. उनका कहना था कि इससे बेहतर प्रदर्शन  करने वाले राज्यों को नुकसान होगा, जबकि कमजोर प्रदर्शन वाले राज्यों को फायदा मिलेगा. सदस्यों ने बताया कि तेलंगाना सरकार ने इस फॉर्मूले में बदलाव के लिए केंद्र सरकार को अपने सुझाव भेजे थे, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया. समिति ने यह भी माना कि प्रस्तावित कानून के राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभावों के बारे में लोगों को पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई है. सदस्यों  का कहना था कि इस मुद्दे पर जनता के बीच अधिक जागरूकता और स्पष्ट जानकारी पहुंचाने की जरूरत है.

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Published: 28 Jun, 2026 | 11:30 PM

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