फरवरी में अरहर की फसल पर कीटों का खतरा बढ़ा, समय रहते करें बचाव नहीं तो होगा नुकसान

फरवरी में बढ़ते तापमान के साथ अरहर की फसल पर फल मक्खी और फली बेधक कीटों का खतरा बढ़ जाता है. समय पर पहचान और सही उपचार से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है. किसानों को नियमित निगरानी और संतुलित दवा उपयोग की सलाह दी जा रही है.

नोएडा | Updated On: 13 Feb, 2026 | 06:41 PM

Pigeon Pea Farming: फरवरी का महीना आते ही मौसम में हल्का बदलाव शुरू हो जाता है. दिन में बढ़ती गर्माहट जहां फसलों की बढ़वार के लिए जरूरी होती है, वहीं कुछ कीटों के लिए यह मौसम अनुकूल बन जाता है. खासकर अरहर की फसल इस समय सबसे ज्यादा संवेदनशील होती है. अगर किसान समय रहते सावधानी नहीं बरतते, तो मेहनत से तैयार फसल को भारी नुकसान हो सकता है. सही समय पर पहचान और उपचार अपनाकर इन कीटों से आसानी से बचाव किया जा सकता है.

फरवरी में क्यों बढ़ जाता है खतरा

फरवरी में तापमान बढ़ने के साथ अरहर की फसल पर कीटों का हमला  तेजी से बढ़ने लगता है. इस समय फसल में फलियां बन रही होती हैं, इसलिए नुकसान सीधे पैदावार पर असर डालता है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस मौसम में दो कीट सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं-फल मक्खी और फली बेधक कीट. ये कीट फलियों को कमजोर कर देते हैं और दानों की गुणवत्ता खराब  हो जाती है. अगर समय पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो उत्पादन में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी आ सकती है. इसलिए किसानों को इस समय फसल का नियमित निरीक्षण करना चाहिए.

ऐसे पहचानें फल मक्खी और फली बेधक कीट

फल मक्खी आमतौर पर फलियों पर बैठकर  उनका रस चूसती है. इसके कारण फलियां कमजोर हो जाती हैं और दाने छोटे या पिचके रह जाते हैं. वहीं फली बेधक कीट फलियों के अंदर घुसकर दानों को नुकसान पहुंचाता है. बाहर से देखने पर फलियां ठीक लग सकती हैं, लेकिन अंदर से दाने खराब हो जाते हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अगर खेत में फलियों पर छोटे छेद या सूखापन दिखे, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए. यह संकेत हो सकता है कि कीटों का हमला शुरू हो चुका है.

रासायनिक उपचार से ऐसे करें बचाव

कीटों के प्रबंधन के लिए सही दवा और सही मात्रा का उपयोग बहुत जरूरी है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, फल मक्खी से बचाव के लिए डाइमेथोएट या इमिडाक्लोप्रिड का छिड़काव किया जा सकता है. छिड़काव करते समय पानी और दवा का संतुलन बनाए रखना जरूरी है. ज्यादा मात्रा में दवा का इस्तेमाल करने से खर्च बढ़ता है और कीटों में दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता  भी विकसित हो सकती है. किसानों को सलाह दी जाती है कि छिड़काव सुबह या शाम के समय करें, ताकि दवा का असर बेहतर हो सके.

जैविक तरीके भी हैं असरदार

रासायनिक उपचार के साथ-साथ जैविक तरीके अपनाना भी फायदेमंद होता है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बैसिलस थुरिंजिएंसिस का उपयोग कीटों के नियंत्रण में काफी असरदार माना जाता है. यह जैविक घोल कीटों के पाचन तंत्र पर असर करता है और उन्हें खत्म कर देता है. इसे पानी में मिलाकर पूरे खेत में छिड़काव किया जा सकता है. जैविक उपाय अपनाने से मिट्टी की गुणवत्ता  बनी रहती है और पर्यावरण पर भी कम असर पड़ता है. साथ ही फसल सुरक्षित रहती है और पैदावार बेहतर होती है.

Published: 14 Feb, 2026 | 06:00 AM

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