प्रति एकड़ करोड़ों का मुनाफा दे सकती है चंदन की खेती, समझिए लागत और कानूनी शर्तें

चंदन की लकड़ी और उससे निकलने वाले तेल की मांग न सिर्फ भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी हमेशा बनी रहती है. धार्मिक कार्यों, आयुर्वेद, इत्र उद्योग और कॉस्मेटिक सेक्टर में इसकी खपत बहुत अधिक है. यही कारण है कि चंदन को “धीमी खेती लेकिन बड़ी कमाई” वाली फसल कहा जाता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 13 Feb, 2026 | 11:02 AM

Farming Tips: आज खेती सिर्फ साल-दर-साल होने वाली आमदनी तक सीमित नहीं रह गई है. बदलते दौर में किसान अब ऐसी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं, जो भविष्य को सुरक्षित बना सकें और समय के साथ उनकी कीमत बढ़ती जाए. सफेद चंदन की खेती इसी सोच का बेहतरीन उदाहरण है. इसे एक सामान्य फसल नहीं, बल्कि दीर्घकालीन निवेश माना जाता है. एक बार सही तरीके से चंदन के पौधे लगा दिए जाएं, तो आने वाले 12 से 15 वर्षों में यही पौधे किसानों के लिए करोड़ों की कमाई का जरिया बन सकते हैं.

चंदन की लकड़ी और उससे निकलने वाले तेल की मांग न सिर्फ भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी हमेशा बनी रहती है. धार्मिक कार्यों, आयुर्वेद, इत्र उद्योग और कॉस्मेटिक सेक्टर में इसकी खपत बहुत अधिक है. यही कारण है कि चंदन को “धीमी खेती लेकिन बड़ी कमाई” वाली फसल कहा जाता है.

कम मेहनत, लेकिन लंबे समय तक फायदा

चंदन की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें रोज-रोज खेत में मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती. एक बार पौधा जम जाने के बाद इसकी देखभाल अपेक्षाकृत आसान हो जाती है. समय-समय पर हल्की सिंचाई, पौधों की सुरक्षा और आसपास उगने वाली सहायक फसलों का ध्यान रखना ही मुख्य काम होता है.

चंदन का पेड़ आमतौर पर 12 से 15 साल में पूरी तरह तैयार हो जाता है. इसके बाद इसकी लकड़ी और जड़ें बेहद कीमती हो जाती हैं, जिनकी कीमत समय के साथ लगातार बढ़ती रहती है.

बजट 2026 से बढ़ी उम्मीदें

बजट 2026 में उच्च मूल्य वाली फसलों और हाई वैल्यू एग्रीकल्चर को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है. इसमें चंदन जैसी फसलों को भविष्य की खेती के रूप में देखा जा रहा है. सरकार का फोकस पारंपरिक खेती के साथ-साथ ऐसी फसलों पर है, जिनसे किसानों की आय लंबे समय में कई गुना बढ़ सके.

इसके तहत चंदन की संगठित खेती, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग से जुड़े ढांचे को मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है. इससे आने वाले समय में चंदन की मांग और कीमत दोनों के बढ़ने की संभावना है.

चंदन की खेती के लिए कैसी हो जमीन

चंदन की खेती की एक बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए बहुत ज्यादा उपजाऊ जमीन जरूरी नहीं होती. किसान उन जमीनों पर भी चंदन उगा सकते हैं, जहां पारंपरिक फसलें अच्छा उत्पादन नहीं दे पातीं. ऊसर, बंजर और हल्की पत्थरीली जमीन पर भी चंदन की खेती संभव है. हालांकि, दोमट और लाल दोमट मिट्टी को इसके लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. जमीन ऊंची होनी चाहिए, ताकि पानी का जमाव न हो, क्योंकि जलभराव चंदन के पौधों के लिए नुकसानदायक होता है.

होस्ट प्लांट है जरूरी

चंदन का पौधा अकेले पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता. इसे बढ़ने के लिए पास में होस्ट प्लांट की जरूरत होती है. होस्ट प्लांट वह सहायक पौधा होता है, जिसकी जड़ों से चंदन पोषक तत्व लेता है. इसलिए चंदन की खेती में अरहर (तूर), मूंगफली या कुछ दाल वाली फसलों को साथ लगाया जाता है. इससे चंदन का विकास बेहतर होता है और किसान को सहायक फसल से अतिरिक्त आमदनी भी मिल जाती है.

एक एकड़ में कितने पौधे लगते हैं

अगर किसान एक एकड़ जमीन में चंदन की खेती करना चाहता है, तो सही दूरी का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. आमतौर पर 10×10 फुट की दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं. इस हिसाब से एक एकड़ में लगभग 400 से 420 चंदन के पौधे लगाए जा सकते हैं. सही दूरी होने से पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे आगे चलकर लकड़ी की गुणवत्ता बेहतर होती है.

चंदन की खेती की लागत और संभावित कमाई

चंदन की खेती में शुरुआती लागत सामान्य फसलों से थोड़ी अधिक होती है, लेकिन यह खर्च एक बार का निवेश होता है.
एक एकड़ में चंदन लगाने पर करीब 80 हजार से 1 लाख रुपये तक की लागत आ सकती है. इसमें पौधों की खरीद, गड्ढों की खुदाई, होस्ट प्लांट और शुरुआती देखभाल शामिल होती है.

चंदन का पेड़ 12–15 साल में तैयार हो जाता है. मौजूदा बाजार में चंदन की लकड़ी की कीमत 20,000 से 30,000 रुपये प्रति किलो तक बताई जाती है. इस हिसाब से एक एकड़ से 4 से 5 करोड़ रुपये तक की संभावित कमाई हो सकती है.

चंदन की खेती से जुड़े कानूनी नियम

कई किसानों के मन में यह सवाल रहता है कि चंदन की खेती कानूनी है या नहीं. अच्छी बात यह है कि किसान अपने निजी खेत में चंदन की खेती कर सकते हैं.

हालांकि, जब पेड़ काटने का समय आता है, तब वन विभाग से अनुमति लेना जरूरी होता है. यह प्रक्रिया पारदर्शी होती है और नियमों का पालन करने पर किसी तरह की परेशानी नहीं आती. इसलिए किसानों को सलाह दी जाती है कि कटाई से पहले स्थानीय वन विभाग से संपर्क जरूर करें.

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